शाम हो चली है |दिल कुछ उदास है |न मालूम क्यों,कभी कभी ऐसा महसूस होता है |आप सबके साथ भी होता होगा जब दिल अचानक सिकुड़ने सा लगता है |लगता है किसी ने मुट्ठी में भींच लिया हो |शायद कुछ लोग इसे मनोवैज्ञानिक भाषा में डिप्रेशन कहते हैं,लेकिन मुझे लगता है कि यह बहुत आम बात है |या आजकल आम हो गयी है |अक्सर अच्छे भले खुशी के माहौल में ऐसा महसूस होना अजीब ज़रूर है लेकिन ऐसा नहीं कि यह किसी मानसिक रोग की निशानी है |जितना मैं समझ पाया हूँ,मुझे लगता हूँ कि शायद हम बहुत डरने लगे हैं |अभी ठीक से खुश हो भी नहीं पाते कि हमें एक अजीब सा डर आ घेरता है | डर कुछ बुरा हो जाने का |डर अचानक से खुशी छिन जाने का |कई बार तो कुछ नहीं भी हो रहा होता तब भी डर कि शायद कुछ ठीक नहीं होने वाला |अचानक से ऐसा लगता है जैसे हम किसी अँधेरी खाई में बस गिरते चले जा रहे हों |पेट में एक अजीब सी हौलन उठने लगती है,ठीक वैसे ही जब हम किसी ऊंचे झूले से अचानक नीचे आते हैं |
यह डर शायद आम इसलिए हो गया है, क्यूंकि समय इतनी तेज़ी से चल रहा है कि हम सब उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश में हांफने लगे हैं |हर बीतता लम्हा मानो हमसे दौड लगा रहा हो और यह जानते हुए भी कि हम उसके साथ नहीं दौड पा रहे, और तेज़ी से भाग रहा हो |लोग अक्सर कहते हैं कि डर का सामना करके ही उसे हराया जा सकता है |लेकिन इस डर से शायद पार पाना आसान बात नहीं |हो सकता कि मैं हार मान जाता हूँ इसके सामने |जब आपके सामने-सामने हाथ में आई रेत कि तरह सब कुछ छूटता जाये तो शायद ऐसा लगना लाज़मी भी है |लेकिन शायद यह सुन सुनकर नहीं,बल्कि खुद महसूस करके ही सीखा जा सकता है कि रेत को जितना पकड़ो हाथ से उतनी ही निकलती जाती है |मैंने सुना कई बार है,लेकिन समझ ज़रा मुश्किल से ही आया है | तमाम जतन कर लेने के बाद मैंने यह मानकर संतोष ज़रूर कर लिया है कि शायद यह डर आम है |पर सिर्फ यह मान लेने भर से हर बार काम नहीं चलता | न चाहते हुए भी इस डर पर काबिज तो होना ही होगा | नहीं मालूम कि वक्त के साथ इस दौड में उसे कैसे हरा पाउँगा लेकिन अगर हराना है तो दौड़ते तो रहना ही होगा,भले ही इस सिकुड़ते दिल के साथ और न जाने कितनी शामें बितानी पड़ें |
1 comment:
Subah hoti he, sham hoti he,,
zindagi yuhi tamam hoti he,
daud laga rahe he hum khud se,
ya fir harna chahte he zamane se,
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