Saturday, 16 June 2012

वो रूहानी आवाज़..

टी.वी पत्रकारिता में बिताए पिछले कुछ सालों नें मुझे बहुत हद तक मज़बूत बनाया है |मज़बूत इतना कि किसी हस्ती के इंतकाल कि खबर तक मेरे लिए महज़ एक खबर से ज्यादा कुछ नहीं रह गयी |अक्सर अचानक खबर आती है किसी बड़ी हस्ती के चले जाने कि तो मैं भी उसको एक खबर कि नज़र से देखते हुए उसे एक बेहतर कवरेज देने की कोशिश में जुट जाता हूँ |पर उस दिन बहुत अलग महसूस किया जब रूहानी आवाज़ में गाने वाले मशहूर ग़ज़ल गायक मेहेदी हसन साहब के इन्तकाल की खबर मुझे मिली |बदकिस्मती ऐसी कि मैं खुद उस दिन शिफ्ट में था और एक खबर कि तरह उसे देखने पर मजबूर था | कुछ पलों के लिए डबडबा आयीं मेरी आँखों को दोबारा पोछ कर उस इंसान के मरने कि खबर बनाने के लिए मजबूर जो मेरे ग़मों और यादों का हमेशा साथी रहा |

यह बात और है कि जब तक मैंने होश संभाला तब तक मेहँदी हसन साहब नें गाना छोड़ दिया था |लेकिन विरासत में मिली गायन कला की तरफ मेरे रुझान और खुद संगीत के एक छात्र के रूप में मैंने मेहँदी हसन साहब को बहुत करीब से जाना |मुझे अभी भी ठीक से याद है कि हसन साहब की सदाबहार गजलें मेरे कानों में तब से घुलने लगी थी जब मैं ठीक से बोलना भी नहीं जानता था |जो शुरू में सिर्फ कुछ बेहद यादगार धुनें थी मेरे लिए,वो धीरे धीरे दिल के ऐसे जज़्बात बनते गए जो हसन साहब की आवाज़ में पिरोये हुए दर्द के अफ़साने थे |हसन साहब की आवाज़ में जादू था,यह कहना तौहीन होगी उनकी |शायद आजतक उनकी आवाज़ के लिए सबसे सही शब्दों का चयन लता मंगेशकर जी ने किया है |उन्होनें कहा था की हसन साहब की आवाज़ के ज़रिये खुद अल्लाह हमसे बात करते हैं |इसमें कोई शक नहीं कि हसन साहब के नगमों में वो रूहानी ताकत थी जो आपको अल्लाह से जोड़ देने के लिए काफी थी|मुझे ठीक से याद तो नहीं लेकिन शायद उनकी गज़ल ‘रंजिशी सही’वो सबसे पहली गज़ल थी जो मेरे कानों में पड़ी थी |शायर एहमद फ़राज़ के लिखे अल्फाजों को इस खूबसूरती से मेहँदी हसन साहब नें गाया कि आजतक उसकी गूँज हमें उनकी आवाज़ से बाँध देती है | उनके नायाब नगमें ‘गुलों में रंग’ और ‘मोहब्बत करने वाले’ सुनने वालों पर कुछ ऐसा जादू कर देते कि उन्हें रूहानी आवाज़ की मालिक हसन साहब के हर सुर से प्यार हो जाता |

बाकी सभी के लिए मेहँदी हसन साहब भले ही सिर्फ एक ग़ज़ल गायक रहे हों लेकिन मेरे लिए तो वो मेरे गुरु भी थे |उन्हें सुन सुन कर मैंने गाने के बारे में बहुत कुछ सीखा |हालाँकि उनका तो एक अंश बराबर भी मैं मरते दम तक नहीं गा सकूंगा लेकिन फिर भी कोशिश ज़रूर रहेगी कि उनसे ही सीखता रहूँ जैसा की बचपन से सीखता आया हूँ |एक गायक होने के नाते मैंने एक खास बात देखी मेहँदी हसन साहब के बारे में |उनकी सबसे हैरान कर देने वाली खासियत थी उनके हर सुर का इस कदर सधा होना कि उसमें एक कण भर भी इधर से उधर नहीं होता था चाहें वो किसी भी ताल या राग में गायें |अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि बड़े से बड़े गायक भी रिकॉर्डिंग में जितना अच्छा गाते हैं उतना अच्छा लाईव नहीं गा पाते |मैंने आजतक सिर्फ और सिर्फ मेहेदी हसन साहब इकलौते ऐसे गायक देखे जो लाईव हो या रिकॉर्डिंग, हर हाल मे सुरों में शुद्धता बनाये रख पाते थे |उनकी दूसरी बहुत खास बात थी कि अपनी हर गज़ल को गाने के लिए जो भी राग वो चुनते थे वोह बहुत सटीक होता था |मसलन उनकी ग़ज़ल ‘खुली जो आँख’ जो कि उन्होनें राग भंकार में गाई |इस राग की खासियत है कि यह उस समय गाया जाता है जब भोर हो रही होती है लेकिन अँधेरा भी बना होता है | उस राग में जब मेहेदी हसन साहब नें इस ग़ज़ल के बोल “खुली जो आँख, वोह था, न वो ज़माना था, दहकती आग थी तन्हाई थी, फसाना था” को गाया तो इन अल्फाजों को मैंने सिर्फ सुना ही नहीं, महसूस भी किया | बहुत कम लोगों को यह पता होगा की मेहँदी हसन साहब बेहद धीमे गाते थे,मसलन उनके साथ संगत करने वाले तबला वादक तक को कान लगाकर उन्हें सुनना पड़ता था नहीं तो ताल बनाये रखना आसान नहीं था |पर इस धीमी आवाज़ में और चेहरे पर एक अजीब सा सुकून लिए हसन साहब बड़ी से बड़ी हरकत भी आसानी के साथ कर जाते थे और पता तक नहीं चलता था |

आज मेहँदी हसन साहब भले ही हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनके नगमें के रूप में हमें एक ऐसा साथी दे गए हैं जो उम्र के हर पड़ाव पर हमारा साथ देता है |मुझ जैसे और न जाने कितने करोडो लोगों के दिल में आज मेहँदी हसन साहब के चले जाने से वो मायूसी है जो शायद कभी किसी अपने के जाने से भी नहीं हुई हो |उनके जाने से मैंने सिर्फ एक गुरु ही नहीं, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा भी खोया है | जिस तरह अल्लाह को हम देख नहीं सकते और सिर्फ महसूस कर सकते हैं अपने आस पास, उसी तरह मेहँदी हसन साहब और उनके यादगार लम्हों को भी हम महसूस कर सकते हैं और करते रहेंगे आने वाले कई सौ सालों तक क्यूंकि खुद अल्लाह तो ज़मीन पर कई सौ सालों में एक ही बार आते हैं |

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