अचानक अभी आँख खुली |शायद कोई सपना देख रहा था |मैं उन लोगों में से हूँ जो सपने याद नहीं रख पाते |पहले जब यार दोस्त अपने अपने सपनों का ज़िक्र करते, तो बड़ी कोफ़्त होती थी क्यूंकि मेरे पास तो सुनाने को एक भी सपना नहीं होता था |लेकिन धीरे धीरे एहसास हुआ कि अच्छा ही है कि ऊपर वाले नें इतनी याददाश्त ही नहीं दी मुझे कि अपने सपने याद रख सकूं |क्या करूँ याद रख कर ये सपने ?किस काम के हैं ये ?देखना तो आसान है लेकिन जब टूटते हैं तो इतने टुकड़े हो जाते हैं कि चुनकर बीनना तक मुश्किल हो जाता है |नुकसान इतने पर ही रुक जाता तो भी शायद सुकून मिल जाता,लेकिन ये तो ऐसा नुकसान दे जाते हैं कि एक लंबे अरसे तक दुखता रहता है |टूटे सपनों के ये अनगिनत टुकड़े दिल में जा धंसते हैं |अंदर तक घुस जाते है कमबख्त |दिल बेचारा बस यूहीं धड़कता रहता है |कभी सिकुड़ कर, कभी ऐंठ कर, कभी बस कुछ पलों के लिए रुक कर कोशिश करता रहता है इन टुकड़ों के धंसने से उठे दर्द को झेलने की |पर इसकी हर हलचल दिमाग भी तो पढ़ लेता है |ये दिल चाहें इस दर्द को कितना ही छिपा ले,लेकिन ये दिमाग इस दर्द को पूरे बदन में फैला देता है |नसों में बहने लगता है ये दर्द | इतनी हिम्मत कर जाता है कि कभी कभी तो रूह तक छूने की कोशिश करने लगता है |
न जाने क्यों ये दर्द सिर्फ महसूस होता है | इसका कोई और छोर तक भी नहीं दिखता | कोई सिरा नहीं दिखता, नहीं तो इसे वहीं से खींच कर खुद में से निकाल पाता |अब तो आंसू भी थक जाते हैं इसके सिरों को ढूँढने की कोशिश करते करते | जलन सी महसूस होने लगती है आँखों में | लगता है कि अब इन आँखों से दर्द खून के साथ बहने लगेगा | अब तो लगता है दिल ही थम जाये तो शायद ये दर्द कुछ कम हो जायेगा | बाकि सपने याद रहे न रहे, लेकिन अब सिर्फ यही सपना दिखता है कि इस दिल को रोककर,खुद अल्लाह ही दर्द से निजाद दिला दे |उम्मीद करता हूँ कम से कम ये सपना तो नहीं तोडेगा वो मेरा |
No comments:
Post a Comment