Tuesday, 7 August 2012

मेरा खुदा

लाशों के बीच में यह कौन खड़ा है
क्या मेरा अक्स है ये, या मेरा खुदा है
मैंने तो रंजो गम की महफ़िल सजाई थी
हारना तो तय था, बस आखिर का सिरा है

खामोश क्यों खड़े हैं, एहसास आज मेरे
बेजान दिल का क्या है, पत्थर से बना है

खुद खुदा भी मेरी हालत पर आज रोया
अल्लाह तो बहुतों का है तू, मेरा बस तू ही बचा है

मैंने क्या खता की, ऐसी जो मुझको सजा दी
बेहरहम मुंसिफ था, मुझसे क्या गिला है

हवाओं का रुख बदलने से पहले, बातें कुछ और थी
अब बातें क्या हैं, उनसे तो नश्तर ही भला है

काफिर तो  हम न थे,  न जाने तुझको क्यों लगे
पैरहन तो अब नया है, जाने तू अब क्यों खफा है

कहते हैं वक्त ठहरकर, करवट बदलता है ज़रूर
मेरा तो एक सदी से, सोया  युहीं हुआ है 

खुशियाँ हैं या बुलबुले, कुछ ऐसे लम्हों के
एक मेरा भी बना था, यादों में छिपा है

मरहम न जाने कैसे, यूं मुझसे खो गया
घावों से अब तलक मेरे, खून रिस रहा है

वो कहते हैं कि उनको, मैं मानता नहीं कभी
इंसान बड़ा है, या पैगम्बर बड़ा है
लाशों के बीच में यह कौन खड़ा है...


Monday, 6 August 2012

तन्हाई के अँधेरे




अब तक आप सभी मुझे एक लेखक के तौर पर कुछ हद तक तो जान ही चुके होंगे |आईये आज मैं आपको अपने में छिपे एक शायर से भी मिलाता हूँ जो कभी कभी कुछ लिखने का शौक रखता है |उम्मीद है आप सबको मेरी ये कोशिश अच्छी लगेगी |


तन्हाई के उन अंधरों में तुम बहुत याद आये
दोज़ख में काटे दिन, न जाने कब मौत आये
ए खुदा तू भी गया रूठ मुझसे
बेजाँ जिस्म की रूह नोचते, वक्त के ये साए

एक ज़माने में ख्वाबों का गुलिस्तां, महका करता था जहां
सेहरा की आंधी में, सिसकियाँ लेते बेरंग मौसम आये

ऐतबार न था खुद के, हौसले पे तुझसे पहले
वादों के दामन पर, बेइंतहा पैबंद आये

क़यामत किसको कहते हैं, ये हमें मालूम न था
यूं अचानक सामने, हसरतों के कातिल आये

यूं अकेले कब तलक, सन्नाटों से लडूंगा
दामन-ए-सब्र भी, बेबसी की इन्तहा से आजिज़ आये  

कैफियत थी कुछ ऐसी, कि आसुओं में बह गयी
ग़मों से दोस्ती कर, खुदी को खुश करते आये

नाकाफी क्यों लगता है, इस दिल का धड़कना
साँसों से कश्मकश थी, कब्रों में बसने आये
तन्हाई के उन अंधरों में तुम बहुत याद आये ..


Wednesday, 1 August 2012

जंग

एक दिन और कट गया है |लगता है ज़िंदगी से लगातार चलती जंग में कम से कम दो बालिश्त ज़मीं पर तो अपना कब्ज़ा हो ही गया है |जंग ही कहना बेहतर होगा क्यूंकि जद्दोजेहद में कम से कम सुस्ताने की फुर्सत तो नसीब हो जाती है |पर इसमें तो बिना रुके,बिना थके बस लड़ते रहने के अलावा कोई चारा ही नहीं |ज़रा थकान हुई नहीं कि ज़िंदगी बमुश्किल हासिल हो पाई उस दो बालिश्त ज़मीं पर भी फ़ौरन अपना कब्ज़ा जमा लेती है और फिर हम जिंदगी को नहीं बल्कि जिंदगी हमें चलाने लगती है | मेरी बात और है, मुझे तो लड़ने से हमेशा ही परहेज़ रहा |नतीजतन, बिना लड़े ही जिंदगी के सामने हथियार डाल दिए अक्सर |मालूम न था कि एक दिन जिस चीज़ से इतना परहेज़ है उसी में इस कदर डूब जाना होगा कि फिर वापसी का कोई रास्ता नहीं |ऐसा नहीं है कि मैं अकेला ही इस जंग में शामिल हूं, मेरे साथ और भी बहुत से हैं जो कुछ इसी तरह की कैफ़ियत से जूझते नज़र आते हैं |पर शायद मैं सबसे नया हूँ इसलिए मैं ही सबसे ज्यादा जूझता महसूस कर रहा हूँ |कुछ लोग ऐसे भी दिख जाते हैं जिनको इस जंग को लड़ने में मज़ा आने लगा है |शायद इसलिए क्यूंकि वो जानते हैं कि हार तो हो ही चुकी हैं मगर कम से लड़ते लड़ते हार का एहसास कम हो जाता है |खैर मेरे लिए तो सांस लेना ही किसी जंग लड़ने से कम नहीं साबित हो रहा |

                         अभी अभी एक छोटी सी चिड़िया सामने के एक दरख़्त की ज़रा ज्यादा ही झुकी हुई डाली पर जा बैठी है | कुछ देर हल्के पाँव से डाली पर चहल कदमी के बाद वापस अपनी तय जगह पर बैठ एक टक कुछ देख रही है |मानों यह देखने की कोशिश कर रही हो कि कौन कौन ऐसा है जिसने हार मान ली है और हथियार डाल दिए हैं |शायद यह कोई मामूली चिड़िया नहीं बल्कि खुदा का ही कोई नुमाइंदा है जो कुछ ऐसी खास जिंदगियों को चुनने आया है जो अब और लड़ने का माद्दा नहीं रखती |शायद इसी के इशारे के बाद उनसे जीने का हक छीन लेगा ऊपर वाला|एक पल को नज़रें तो मेरी भी टकराई उससे लेकिन एक ही नज़र में मैंने यह ज़रूर समझा दिया उसे कि मैं हार नहीं मानूंगा |उम्मीद तो यही है कि वो मेरा ये पैगाम खुदा तक ज़रूर पहुचेगा |उसको भी तो फक्र होना चाहिए कि उसका एक बाशिंदा उसके सिखाए हर सबक का भरपूर इस्तेमाल कर रहा है इस जंग को जीतने में |आज भले ही दो बालिश्त ज़मीं को अपना बना पाया हूँ,मगर कल कुछ और हिस्सा ज़रूर अपना कर सकूंगा |औरों का तो पता नहीं लेकिन मेरी जंग जीतने के लिए ही है और वो जीत मुझे आज नहीं तो कल मिलेगी ही |