Thursday, 14 June 2012

जापान की त्रासदी

यह मेरा एक पुराना लेख है जो कि आई बी एन खबर वेबसाईट पर मैंने आज से करीब एक साल पहले लिखा था जब जापान को एक भयंकर भूकंप के झटके के बाद सुनामी का सामना करना पड़ा था | प्रकृति के इस भयावाह खेल में कई हज़ार जाने गईं थी |आज अपने ब्लॉग कि शुरुआत में मैं तब से लिखे मेरे कुछ ऐसे लेख आपसे बाँट रहा हूँ जिनको पाठकों नें बहुत पसंद किया था |

भले ही इस भयानक हादसे को हुए कुछ दिन बीत चुके हैं। लेकिन अभी भी आंखों को यकीन न आ सकने वाली यह तस्वीरें ज़हन से नहीं जा पाती। भूलना भी चाहूं तो भूल नहीं सकता क्योंकि एक टीवी पत्रकार के नाते इसे लगातार देखते रहना मेरी ज़रूरत भी है और मजबूरी भी। टीवी पत्रकारिता की एक बड़ी जरूरत हमेशा से विजुअल रहा है या यूं कहिए की यही उसके अस्तित्व का सबसे अहम हिस्सा है। मुझे आज भी याद है की 2004 में इंडोनेशिया सुमात्रा में आई भयानक सुनामी की एकलौती झलक जो हमें सैटेलाइट तस्वीरों से मिल पाई,उसको हमने कई बार दर्शकों को दिखाया था। उसके मुकाबले में जापान में आई इस सुनामी की लाइव तस्वीरें तो टीवी पत्रकारिता की दुनिया के लिए एक वरदान से कुछ कम नहीं। मैं भी शायद उन्हीं में से एक था जो पहली बार इन तस्वीरों को देखकर अपनी कुर्सी से उछल पड़ा था और अनायास ही यह कह उठा था की 'वाह क्या विजुअल है'। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते मुझे एहसास हुआ की जापान के लोगों ने कैसा महसूस किया होगा जब यह हादसा घटा। एक झलक में तो यह दिख ही जाता है की लोग किस तरह परेशान और लाचार हैं। लेकिन सुबह से शाम तक जापानी चैनलों को देखते रहने और उनकी हर बात को गौर से सुनकर लिखते रहने के बाद ही मैंने पाया की असल में उनपर क्या बीत रही है। एक तरह से कहिए तो इन कुछ दिनों में सुबह से शाम तक लगातार जापान में आई इस भयानक त्रासदी से जुड़ी हर छोटी बड़ी खबर का पीछा करते हुए मैंने खुद को उन्हीं बेसहारा लोगों के बीच खड़ा पाया।

जापानी भाषा दुनिया की कुछ सबसे कठिन भाषाओं में गिनी जाती है, लेकिन दर्द ने मेरे और जापान वासियों के बीच की इस दीवार को मिनटों में पिघला कर रख दिया। जापानी से अंग्रेजी में अनुवादित खबरें सुनने की जरूरत उन आसुंओं को बयान करने के लिए ज़रूरी नहीं जो मैंने उस मां की आंखों में देखे जो अपनी ढाई साल की मासूम बच्ची से बिछुड़ गई। जब सुनामी आई तो उसकी बच्ची उसकी गोद में आराम से सो रही थी, लेकिन कुछ ही पलों में आई इस भयानक सुनामी ने उसको अपनी बच्ची से एक झटके में जुदा कर दिया। असहाय मां अपने आप को और उसको बचाने की जद्दोजहद में कब अपने दिल के टुकड़े को खो बैठी यह उसे याद भी नहीं। बस याद है तो अपनी बच्ची की वो नन्हीं उंगलियां जिनको पकड़कर उसने हाल ही में चलना सिखाया था। वैसे ही दर्द से भरी दास्तान है बुंगो नाम के व्यक्ति की जो जगह-जगह अपनी पत्नी को ढूढ़ते हुए पहुंचे हैं। मियादी शहर के बीचों-बीच खडी़ एक स्कूल की उस बिल्डिंग में जो कि उन कुछ चुनिन्दा बिल्डिंगों में से एक है जो सुनामी के वार जो झेल पाई। आठ सौ लोगों का रैन बसेरा बन चुकी इस बिल्डिंग में कई घंटे बिताकर इसका हर कोना छानने के और नामों की हर लिस्ट देखने के बाद आज भी हताश बुंगो अपने दो छोटे बच्चों के पास इसी तरह के एक-दूसरे रैन बसेरे की ओर लौट गए जहां से उनको दो दिन पहले ही अपने दोनों बच्चे मिल पाए थे। यह उन कुछ हज़ारों हज़ार कहानियों का केवल एक अंश भर हैं जो की जापान की त्रासदी कुछ पलों में ही लिख गई।

अभी प्रकृति का क्रोध ठीक से शांत भी नहीं हुआ था कि मानव निर्मित परमाणु रुपी राक्षस ने अपने शिकंजे में जापान वासियों को धीरे-धीरे जकड़ना शुरू कर दिया। एक टीवी पत्रकार के लिए ही नहीं, किसी भी इंसान को ये तस्वीरें हिला देने वाली थी। असहाय,परेशान लोग अपने-अपने घर छोड़कर पैदल ही सुरक्षित स्थानों की तरफ जाते दिखे। फुकुशिमा न्यूक्लियर पॉवर प्लांट से 18 किलोमीटर दूर रहने वाली एक अधेड़ उम्र की महिला एक छोटी सी गठरी में अपना सब कुछ समेटे शहर छोड़ते हुए कहती हैं कि 'सरकार का आदेश है कि रेडिएशन से बचने के लिए इलाका तुरंत खाली कर दिया जाए'। लेकिन भय से भरी इस महिला की आंखें यह बयां कर देने के लिए काफी है कि वह यह भी नहीं जानती की आखिर वह भाग किससे रही है और कहां तक भाग पाएंगी। क्योंकि तेज़ी से फैलता परमाणु रेडिएशन न तो दिखाई देता है और न ही इसकी पहुंच की कोई सीमा है।

जापानियों के जीवन से अब शायद हमेशा के लिए जुड़ चुका यह हादसा भले ही पत्रकारिता में मेरे तजुर्बे को एक नया आयाम दे दे,लेकिन मेरे अन्दर के इंसान को हमेशा यह याद ज़रूर दिलाएगा की टीवी पर चलने वाला दो मिनट के एक पैकेज में इन भावों को लोगों तक जरूर पहुंचाया जा सकता है। लेकिन उनको जीने का एहसास तभी होता है जब हम उसको केवल एक 'अच्छे विजुअल' की दृष्टि से नहीं बल्कि इंसानी भावनाओं से भी जोड़ कर देखते हैं।

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