Saturday, 16 June 2012

मेरे दोस्त

रात गहरी हो चली है | आस पास सिर्फ हवा में फैले सन्नाटे के अलावा कुछ और सुनाई नहीं देता | अमूमन लोग रात को सोते हैं,मगर मैं जागने का शौक रखता हूँ |किसी भी समझदार इंसान की नज़र में यह पागलपन ही है |हो भी क्यों नहीं, अगर सारी दुनिया रात को सो रही है तो मुझे जागने का हक कैसे हो सकता है |और यह सिर्फ रात को जागने तक सीमित नहीं है, हर वो चीज़ जो हम भीड़ से अलग हट कर करना चाहते हैं हमें न जाने क्यों कटघरे में खड़ा कर देती है | पहले ऐसा करता था तो ज़रूर अपने आप से पूछता था कि क्या मैं वाकई पागल हूँ, मानसिक रोगी हूँ या फिर बस यह एक जिद है अलग लगने की |मगर जैसे जैसे वक्त बीता,मैं बड़ा हुआ तो समझ में आने लगा कि मैं औरों से शायद अलग ही हूं |अलग इसलिए क्यूंकि मेरे लिए जिंदगी के मायने मेरे अपने बनाये हुए रहे हैं,न कि वो जो माँ बाप नें सिखाए या फिर किताबों में पढ़े | पर यह बिलकुल ज़रूरी नहीं कि जिंदगी की तरफ मेरा रवैय्या सही ही हो | लेकिन हर इंसान की तरह मैं भी अपनी सोच को सर्वोपरि मानते हुए बस वही करता आया हूँ जो मुझे ठीक लगा है |मसलन रात का जागना ही ले लीजिए, लेकिन इसके पीछे एक वजह है |रातों से बेहद पुराना नाता रहा है मेरा | जब से एक अलग कमरा मिला और आँखें जबरन न बंद कर लेने की आज़ादी,शायद तब पहली बार रात से सामना हुआ |याद नहीं कब पहली बार मुलाकात हुई थी रात से, लेकिन बहुत धुंधला धुंधला याद है कि मुलाकात थी बड़ी यादगार| पहली बार में ही अच्छे दोस्त बन गए थे हम दोनों |शायद इसलिए क्यूंकि रात नें मुझे वो देने का वादा किया जो कि इंसानों नें देने से साफ़ इनकार कर दिया | और वो था सुकून | एक तरफ सैंकडों इंसानों की इस दुनिया में कोई एक आद भी शायद ही मिले जो आपको सुकून पहुंचाए | हाँ, वादा देने वाले तो बहुत मिल जायेंगे, लेकिन कोई सच में सुकून दे पाए तो जानें |और अगर कोई भूल से मिल भी जाये जो सुकून दे,तो तुरंत बदले में कोई न कोई शर्त ज़रूर लगा देता है |और बस तभी सारा सुकून उस एक शर्त की क़ुरबानी चढ जाता है | पर रात ऐसा कुछ नहीं मांगती | यह बस देती है, दिल खोलकर सुकून देती है | रात से बहुत कुछ सीखने को भी मिला है मुझे | रात से सब्र करना सीखा है मैंने | शांत रहना सीखा है | सब कुछ अपने अंदर समेट लेने की काबलियत देखी है मैंने |ऐसा लगता है मानों ऊपर वाला रात के रूप में हमारी जिंदगी की स्लेट को रोज एक बार साफ़ कर देता है ताकि अगले दिन सूरज की पहली किरण के साथ हम उस स्लेट पर बीते हुए कल से भी कुछ बेहतर लिखने की शुरुआत कर सकें |मैंने भी खूब निभाई है दोस्ती इसके साथ जाग-जागकर |लेकिन पिछले कुछ समय से दोस्ती इतनी अच्छी नहीं रही |कोशिश तो मैंने बहुत की है हम दोनों के रिश्ते की मजबूत बनाये रखने के लिए, लेकिन जब इंसानी रिश्ते ही ठीक ढंग से नहीं निभा पाया तो यह तो सिर्फ रात ही है |

लेकिन हर कमज़ोर इंसान की तरह जिसे हर वक्त जीने के लिए कोई न कोई सहारा चाहिए ही होता है, मैंने भी कुछ नए दोस्त ढूंढें, रात से अपनी दोस्त कम होने के साथ |या यूं कहिये कि रातों से अब वैसी दोस्ती नहीं जैसी पहले थी क्यूंकि अब उसकी जगह किसी और जिगरी दोस्त नें जो ले ली है |हाल ही बने इस नए दोस्त का नाम है दर्द |ऐसा नहीं कि अकस्मात ही आ गया हो जिंदगी में यह |अगर अचानक आया होता तो शायद इतना अच्छा दोस्त तो कभी न बन पाता |यह तो बहुत पहले से ही जिंदगी का हिस्सा रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से जब से इसको बेहतर जाना है तब से इसकी आदत पड़ गयी है |अब इस दर्द के बिना जिंदगी के बारे में सोचना भी बेमानी सा लगता है |ऐसी गहरी दोस्ती तो रातों के साथ भी नहीं थी जैसी कि दर्द के साथ हो गयी है |अजीब सी ताकत है इस कमबख्त में |चाहें जितना दूर जाने की कोशिश करो इससे,यह साथ नहीं छोड़ता |कभी धडकनों का हिस्सा बन जाता है तो कभी साँसों में ही घुल जाता है |और मेरी किस्मत देखिये,जब कभी इससे कुछ हद तक निजाद पाने की कोशिश करता भी हूँ तभी किसी न किसी का दिया दर्द मेरे दामन में आ गिरता है |शुरू में बेहद तकलीफ होती थी,लेकिन फिर इससे दोस्ती कर ली |सोचा कि जब इसके साथ ही जीना है तो इससे भाग कर क्या फायेदा | बस वो दिन है और आजका दिन है, दोनों पक्के दोस्त बन चुके हैं |पर यह दर्द बहुत मांगता है |यह रात की तरह नहीं जो बस देता जाए और बदले में कुछ न मांगे |यह सिर्फ दिल के एक हिस्से तक ही सीमित नहीं रहना चाहता | यह फैलता जाता है, फैल रहा है, मेरी नसों के ज़रिये, मेरे खून के एक एक कतरे में,  मेरे दिमाग में, मेरी रगों में | भूलता जा रहा हूँ खुद को क्यूंकि इस दर्द नें सोचने समझने की ताकत पर भी शायद अब अपना घर बनाना शुरू कर दिया है |पता नहीं और क्या क्या मांगेगा यह दर्द |अब कभी मन भी करता है कि इससे दूर भाग कर अपनी पुरानी दोस्त रात के आगोश में ही समां जाऊं तो भी यह ऐसा होने नहीं देता |यह किसी और के साथ बांटने को मुझे तैयार ही नहीं |पर यह बात सही है कि शायद अब किसी और से दोस्ती न कर पाऊँ कभी |या यूं समझिए कि शायद यह दर्द इस काबिल छोड़े ही नहीं कि फिर कभी दोस्ती कर पाऊँ किसी और से |अब सिर्फ एक ही दोस्त बनाने की ताकत है मुझमें | अल्लाह से दोस्ती करना चाहता हूँ |एक बार उसके दामन में सिर झुका कर जी भर के रोना चाहता हूँ |सिर्फ एक वही है जो दर्द से निजाद दिला पाता है |पर अब अल्लाह नें भी मुंह मोड लिया है |जानता है न कि दर्द उसने तो दिया नहीं, मेरा खुद का लिया हुआ है, इसलिए मुझे अपने हाल पर छोड़ दिया है | अकेला, अपने इस नए दोस्त से दोस्ती निभाने को और रहम की उम्मीद में बस बेबस एक टक उसकी ओर ताकते रहने को |

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