जापान में एक साल पहले आई भयानक सुनामी के बाद पैदा हुए परमाणु संकट पर मैंने यह लेख भी तकरीबन एक साथ पहले ही लिखा था |यह एक ऐसा हादसा था जो बहुत लोगों को ठीक से समझ नहीं आया और जिसका असर आज से पचास साल भी महसूस किया जायेगा | ---
अक्सर कहा जाता है कि जीवन और मृत्यु ईश्वर के हाथ में है। एक तरह से देखा जाए तो यह कथन सही भी है। औरों की तरह मैं भी इसमें विश्वास रखता था। पर जापान की विनाशलीला देखने के बाद दिमाग में उठते कई विचारों के बीच यह तय कर पाना कि इस कथन में कितनी सच्चाई है,थोड़ा कठिन सा जान पड़ता है। इसमें दो राय नहीं कि जापान में आई इस भयानक तबाही को रोक पाना किसी भी मनुष्य के हाथ में नहीं था,लेकिन जो कुछ जापान में उसके बाद हुआ उसमें मानव का कितना दोष था इस बारे में मन में एक द्वंद्व सा छिड़ गया।
इस भीषण त्रासदी के एक सप्ताह बाद जीवित बच गए लोग अब भी यह समझने में असमर्थ हैं कि वो खुद को कितना भाग्यशाली मानें। वजह है इस प्राकृतिक आपदा के लगभग तुरंत बाद ही पैदा हुआ परमाणु संकट। जापानवासियों के अंदर घर कर चुके इस भय और निराशा के एहसास की एक झलक से मेरा तब सामना हुआ जब मैंने रूंधे गले से अपने छोटे बच्चे से बिछुड़ते एक पिता की आपबीती सुनी। उन्होंने बताया कि किस तरह अपने पूरे परिवार को वो सुनामी में खो चुके हैं। वो अपने पांच वर्षीय बच्चे को लेकर फुकुशीमा न्यूक्लियर पावर प्लांट के हादसे के बाद वहां से भागने पर मजबूर हो गए।
अपने पूरे परिवार को खोने का दर्द अपने अंदर समाये अकिहिको ने अभी इस बात का संतोष करना शुरू ही किया था कि कम से कम वो और उनका पांच वर्षीय बेटा तो भाग्यशाली हैं कि उनको जापानी परमाणु वैज्ञानिकों के एक दल ने सूचित किया कि उनके बेटे के शरीर में परमाणु रेडिएशन के अंश पाए गए हैं। पिछले दो दिन से अपने बच्चे से दूर रोज की तरह आज भी अकिहिको अपने पांच वर्षीय बेटे से शीशे की एक मोटी दीवार के इस पार खड़े इशारों में यह बताने की कोशिश में लगे हैं कि वो उसे कितना प्यार करते हैं और जल्द ही उसके साथ होंगे। कभी न भूल पाने वाली इन तस्वीरों में समाई जीवन की इस विडम्बना को देखकर आंखें डबडबा जाती हैं। यही हाल है उन सभी परिवारों का जिनका कोई भी सदस्य परमाणु रेडिएशन से संक्रमित पाया जा रहा है। सभी को इसी तरह औरों से अलग कर उनका उपचार किया जा रहा है।
हर पल वातावरण में घुलते इस विष से भली-भांति परिचित जापानियों के साहस की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। अपने आस-पास लगातार मंडराते इस खतरे से लड़ते यह लोग एक ही झलक में अपनी दृढ़ता और अपने कभी न हारने वाले जज्बे की मिसाल सामने रख देते हैं। हादसे के वक़्त से लगातार जापान के हालात पर नजर बनाये हुए मैंने जापानी टीवी चैनलों पर हर पल दिखाई जा रही ऐसी कई तस्वीरें देखीं जिनमें हादसे के बाद बुनियादी वस्तुओं के अभाव के चलते लंबी-लंबी कतारों में लोग खड़े दिखे। पर घंटों से इन्हीं कतारों में खड़े लोगों के धीरज की सीमा का एहसास तभी हुआ जब मैंने उनमें से कई चेहरों पर हताशा के बीच भी मुस्कराहट पाई। कितने ही ऐसे लोगों की आपबीती सुनी जिनको कई दिनों से ठीक से खाना भी नहीं मिला है लेकिन फिर भी वो बौखलाकर कानून अपने हाथ में नहीं ले रहे,बल्कि अनुशासन बनाए रखते हुए उन तक मदद पहुंच पाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपने इसी अनुशासन और दृढ़ इरादों के चलते आज छोटा सा जान पड़ने वाला यह देश विश्व का तीसरा सबसे अमीर देश है। हालांकि इस त्रासदी ने जापान को आर्थिक रूप से भी हिला दिया लेकिन विश्व के सबसे विकसित देशों में गिने जाने वाला यह देश लगभग तुरंत ही इससे उबरने की कोशिश में लग गया और कुछ हद तक सफल भी होता दिखा।
कई बार गिरकर उठने की ताकत रखने वाला यह छोटा सा देश पहले भी ऐसे हादसों से जूझ चूका है। लेकिन इसबार भी यहां ऐसा ही हो पाएगा ऐसा कहना मुश्किल है। सालों पहले हुए हिरोशिमा और नागासाकी के घावों पर समय के मरहम ने ठीक से असर करना शुरू ही किया था कि फुकुशीमा के हादसे ने नए घाव बना दिए हैं। जहन में परमाणु विनाश के नाम पर पचास साल से भी पहले हुए इस हादसे की एकमात्र तस्वीर, लाखों लोगों के मरने के आंकड़े और सैकड़ों लोगों के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी चलती बीमारियों की कहानियां सुनते बड़े हुए मैंने कभी यह कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन ऐसा भी आयेगा जब मैं इन्हें फिर से सजीव रूप लेते देखूंगा। भले ही आज जापानी सरकार इस सच को छिपाने की कोशिश करे कि विनाशकारी रेडिएशन का खतरा धीरे-धीरे जापान को निगल रहा है,पर जापान में रहने वाले करोड़ों लोगों में फुकुशीमा की प्रतिदिन प्रसारित की जा रही लाइव तस्वीरों से कहीं न कहीं उगते सूरज के देश पर अस्त होते सूरज का भय तेजी से घर कर रहा है।
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