Saturday, 23 June 2012

रेशे जिंदगी के

उम्र, बहुत ज्यादा नहीं है मेरी, इसलिए यह तो नहीं कहूँगा कि जिंदगी के बारे में बहुत ज्यादा जानता हूँ लेकिन शायद कुछ हालातों नें, और कुछ आस पास के लोगों नें ही इतना सिखा दिया कि जिंदगी औरों से कुछ ज्यादा ही बेहतर समझ आने लगी |असल में ऊपर वाले नें इसकी बनावट ही इस कदर कुछ खास की है कि जिंदगी के रेशों के इस ताने बाने को समझ पाना हम इंसानों के बस की बात नहीं | न मालूम क्यों, मुझे हमेशा ऐसा लगा है कि जब हम दुनिया में आते हैं तब जिंदगी के यह रेशे दूधिया सफ़ेद रंग के होते हैं |सफ़ेद इसलिए क्यूंकि यह सबसे पाक,सबसे साफ़ और ऊपर वाले का अंश है | लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ती हैं, धीरे धीरे ग़मों और तकलीफों के काले धब्बे इन सफ़ेद रेशों पर पड़ने लगते हैं |कुछ धब्बे ऐसे होते हैं जो बस झाड़ भर लेने से ही बहुत हद तक साफ़ हो जाते हैं लेकिन कुछ धब्बे गाढे होते हैं और उन्हें वक्त से साफ करना पड़ता है | हम सब तो पूरी जिंदगी इन्हीं सफ़ेद रेशों को सफ़ेद बनाये रखने की जद्दोजेहद में निकाल देते हैं |
                     औरों की तरह इन रेशों को यू हीं सफ़ेद रखने की कोशिश करता तो मैं भी था, लेकिन मेरे रेशों में ग़मों के वो काले धब्बे कुछ इस कदर जज़्ब हो गए,कि वक्त से कई बार साफ़ करने के बाद भी बमुश्किल सिर्फ कुछ हद तक ही धुंधले पड़ पाए |इस लगातार साफ़ करने की कोशिश में मेरे रेशे ही इतने कमज़ोर हो गए कि बहुत सी जगहों से उधड़ गए |कुछ अजीब से मटमैले से रंग के दिखने लगे हैं अब|इन रेशों को सफ़ेद रख पाने की कोशिश तो बहुत पहले छोड़ दी थी मैंने, अब तो सिर्फ खुशियों के छोटे छोटे पैबंद इनपर लगा, इन चिथड़ों में बदल चुके रेशों को साथ रखने की कोशिश करता हूँ |

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