Thursday, 14 June 2012

अट्ठाईस साल का सपना पूरी करती वो रात

कुछ समय पूर्व जब भारत नें विश्व कप क्रिकेट अपने नाम कर दुनिया भर में अपना लोहा मनवाया था तब मेरा यह लेख काफी सराहा गया जो मैं आज आप सबसे बाँट रहा हूँ | ---


मेरा जन्म सन 1983 में हुआ था। स्वाभाविक सी बात है कि मेरे लिए हमेशा से इस साल की एक खास अहमियत रही है पर होश संभालने पर मुझे मालूम हुआ कि यह साल सिर्फ मेरे लिए ही नहीं,बल्कि उन सभी भारतवासियों के लिए खास था जो क्रिकेट को एक धर्म का दर्जा देते हैं। यह वही साल था जब भारत के ग्यारह महानतम खिलाड़ियों ने मिलकर भारत को पहली बार विश्व कप दिलाया था। आने वाले सालों में मैंने कपिल देव द्वारा लॉर्ड्स के मैदान पर वर्ल्ड कप ट्रॉफी को उठाकर चूमते हुए शॉट्स को कई बार देखा पर अंदर ही अंदर हमेशा ऐसा लगा की काश मैं भी यह लम्हा उस वक्त देखकर वही अहसास कर पाता जिसकी अनगिनत कहानियां सुनते हुए मैं बड़ा हुआ था।
पर मेरा अपने होशो हवास में भारत को दुबारा वर्ल्डकप की ट्रॉफी पाते देखना एक अधूरा सपना सा ही बन कर रह गया। आख़िरकार भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी द्वारा मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में लगाए उस छक्के ने केवल मेरा ही नहीं बल्कि उन करोड़ों भारतीयों का 28साल पुराना वो सपना साकार कर ही दिया। उस एक पल में मेरे दिमाग में भारतीय क्रिकेट इतिहास के वो स्वर्णिम पल घूम गए जब कपिल देव ने भारत का सर गर्व से ऊंचा करा था। खुशी की वो सीमा शायद ही मैंने कभी महसूस की थी जब मैंने सचिन की आंखों में छलकते आंसुओं को देखा जो हम सबकी आंखों को नम कर गए। पहली बार एक विश्व विजेता होने के एहसास दिलाते इन पलों ने मेरे कई सालों के इन्तज़ार का भी अंत किया।
यह बात जग ज़ाहिर है कि भारत में क्रिकेट एक धर्म से कम नहीं माना जाता पर इसका सही अंदाजा मुझे तभी हुआ जब मैंने उस रात देशभर में छाई क्रिकेट की दीवानगी को अपनी आंखों से देखा। दिल्ली की सड़कों पर उस रात जो कुछ भी दिखा उसे शब्दों में ढाल पाना कठिन सा लगता है। पिछले 28सालों से दिल्ली में रहते हुए भी मैंने दिल्ली को इस तरह नाचते गाते हुए नहीं देखा था जैसा मैंने उस रात देखा। हर वक्त तेज़ी से दौड़ती भागती दिल्ली मानों रुक सी गई थी और भारतीय क्रिकेट की एक जीती जागती विजय यात्रा की तस्वीर लग दिखाई दे रही थी। कई किलोमीटरों तक फैले लंबे ट्रैफिक जामों के बीच फंसे लोगों को मैंने पहली बार मुस्कुराते,चिल्लाते और नाचते देखा। दीवानगी का आलम यह था की लोग गाड़ियों के अंदर कम और गाड़ियों की छतों और बोनट पर ज्यादा बैठे दिखे। लगभग सभी के हाथों में भारतीय राष्ट्र ध्वज और मूह को तिरंगे के रंगों से रंगा पाया। सभी एक दुसरे से चिल्लाकर और हाथ मिलाकर विश्व विजेता बनने की खुशी का इज़हार कर रहे थे। यही हाल हिन्दुस्तान के हर शहर का था,भले ही ही वोह मुंबई हो,चेन्नई हो या फिर अहमदाबाद।
यह एक ऐसी रात थी जब मैंने हर भारतीय को कंधे से कंधा मिलाकर एक ही वजह से खुशी मनाते देखा। दिल्ली के इंडिया गेट पर रात के तीन बजे भी पैर तक रखने की जगह नहीं थी। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी अपने आप को इस ऐतिहासिक मौके पर खुशी का इज़हार करने से रोक न पाईं। देर रात वो भी बाकी दिल्ली वासियों की तरह अपनी गाड़ी के बोनट पर सवार लोगों के हुजूम के साथ जा पहुंचीं। रातभर मैंने इसी तरह बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी को सड़कों पर नाचते गाते देखा। उस रात इस एक खुशी ने अनजान लोगों को भी एक परिवार जैसा होने का एहसास दिला दिया।
दो हज़ार ग्यारह का वर्ल्डकप अपने नाम कर चुकी इस भारतीय टीम ने 28 साल पुराना सपना तो पूरा करा ही पर साथ ही साथ भारत की 121करोड की आबादी को एक ही धागे में पिरोकर भी रख दिया। यह केवल एक शुरुआत है जिस तरह भारत तेज़ी से क्रिकेट के हर रिकॉर्ड को अपने नाम करता आगे बढ़ रहा है उस तरह यह ज़रूर लगता है कि आने वाले समय में ऑस्ट्रेलिया की ही तरह भारत भी आने वाले वर्ल्ड कपों को भी अपने नाम करेगा। परन्तु इसके लिए भारतीय टीम को लगातार कठिन परिश्रम ज़रूर करते रहना होगा ताकि फिर कभी जीत का यह एहसास केवल बातों के रूप में आने वाले पीढ़ियों तक न पहुंचे और मेरी तरह किसी और क्रिकेट प्रेमी को सालों तक इस एहसास को महसूस करने का इन्तेज़ार न करना पड़े।

No comments: