Thursday, 14 June 2012

आदत

पैदा होते ही हम अक्सर बहुत जल्दी किसी न किसी चीज़ के आदी हो जाते हैं | मसलन रोने के आदी और यह मान लेने के आदी की बहुत जल्द ही हमें चुप कराने कोई तो आयेगा ही, या फिर अपनी हर शरारत पर अपने माँ बाप के चेहरे पर आती मुस्कराहट को देखने के आदी |यह आदतें वक्त वक्त पर बदलती रहती हैं |कभी किसी से बात करने की आदत, कभी कुछ सोचते रहने की आदत,कभी हर किसी का भला सोचने की आदत तो कभी सिर्फ अपने बारे में सोचने की आदत |कभी कभी सोचता हूँ कि इन आदतों के बिना कैसे जिया जाये | मैं भी इंसान ही हूँ | मुझे भी तमाम तरह की आदतें हैं |अच्छी हैं या बुरी यह तो सुनने वाले पर निर्भर करता है |पर आखिर क्यों जीने के लिए किसी खास आदत या आदतों का होने ज़रूरी है | क्या हम उनके बिना अधूरे हैं ? क्या जीने के लिए आदतों का होना इतना ज़रूरी है ? या फिर जिन्हें किसी बात की आदत नहीं वो इंसान ही नहीं |कभी कभी तो यह भी लगता है की क्या सिर्फ खुदा है जिसे किसी बात की आदत नहीं ? यानी अगर खुदा के करीब जाना है तो हमें भी सभी तरह की आदतों से निजाद पाना होगा |
बचपन से अब तक तो यही करता आया हूँ | अल्लाह के करीब जाने के हमेशा दो ही रास्ते देखें हैं | एक ये कि अल्लाह खुद मुझे अपने पास बुला ले या फिर मैं हर आदत से निजाद पा लूं तो शायद अल्लाह के करीब पहुँच जाउँ |पर अफ़सोस आज तक दोनों में ही कामयाब नहीं हो पाया हूँ |पर कोशिश जारी रहती है |फिर सोचा की आदतों की फेहरिस्त तो बेहद लंबी है मेरी,तो तय किया कि आदतों की फेहरिस्त में सबसे ऊपर आने वाली आदतों से शुरुआत करके नीचे की तरफ बढ़ा जाये | हाल ही में एक नयी आदत पर काम करना शुरू किया है | मेरी सबसे बुरी आदत ही कह लीजिए और वो है  प्यार न्योछावर करने की आदत |सुनने में हैरानी होती है न? आखिर किसी को प्यार करने की आदत हो भी तो क्या बुरा है भला |यकीन मानिये अगर इस आदत के आप शिकार नहीं हैं तो बाकी किसी भी आदत से निजाद पाना बेहद आसान हो जाता है |और यह है भी सबसे आम आदत जो हर दूसरे इंसान को होती है |असल में इसकी नींव ही इतनी गहरी है की यह आदत इतनी आसानी से छूटती नहीं |बचपन से ही किसी न किसी को प्यार करते आये हैं हम सब |पात्र भले ही बदलते रहे ताउम्र लेकिन हम प्यार करते रहते हैं |मैंने तो बेहद प्यार किया है |इतना कि करते करते थक गया |शायद औरों से भी कहीं ज्यादा करने की कोशिश करता रहा हूँ इसलिए हांफने लगा हूँ |कभी इस पर अंकुश लगाने की कोशिश नहीं की है,क्यूंकि कभी इसे बुरा माना ही नहीं |बुरा आज भी नहीं मानता हूँ |लेकिन इसका सही अनुपात में होना बेहद ज़रूरी है |

अमूमन लोग प्यार को मीठा कहते हैं |मेरी नज़र में तो प्यार नमक के समान है |अब नमक से क्या लेना देना प्यार का ?इन दोनों में बहुत सी बारीक समानताएं हैं |असल में जिस तरह खाने में नमक की ज़रूरत होती है उसी तरह जिंदगी में प्यार की |खाना के लिए भी नमक एक आदत की तरह ही है जिसके बिना वो स्वादिष्ट बनने से ही इनकार कर देता है |ठीक उसी तरह जैसे जिंदगी एक बोझ लगने लगती है प्यार के बिना | पर यह यहीं तक सीमित नहीं है | भले ही खाने में नमक की कितनी भी ज़रूरत हो, पर अगर नमक थोडा भी ज्यादा हो जाये तो खाना कड़वा हो जाता है,या कम हो जाये खाना ज़ाहिर बात है की बेस्वाद ही जाता है |और ठीक इसी तरह का असर हमें जिंदगी में प्यार की कमी और ज्यादा मिलने से भी देखने को मिलता है |इसका मतलब खाने में नमक का सही अनुपात होना बेहद ज़रूरी है |पर यह कैसे हो सकता है कि हर बार एकदम सही अनुपात में ही नमक खाने में डले | यह सिर्फ तब मुमकिन है जब नमक बेहद सधे हुए हाथों से डाला जाये | पर यह सधे हुए हाथ भी उसी के हो सकते हैं जिसनें खाना कई बार बनाया हो और हर तरह से तोल लेने के बाद ही नमक का सही अनुपात जाना हो |लेकिन प्यार के मामले में तो सही अनुपात जानना और भी मुश्किल हो जाता है|खाना बार बार बनाया जा सकता है,बुरा बन जाये तो फेंका भी जा सकता है |लेकिन जिंदगी में कम और ज्यादा प्यार करने के बाद रिश्तों के बढते बोझ को यूहीं नहीं तोडा जा सकता |यह ढोने होते हैं जिंदगी भर |कभी समाज की वजह से,कभी अपनी आदत की वजह से |और जब यह बोझ बहुत बढ़ जाता है तो जिंदगी की रफ़्तार बेहद धीमी होने लगती है |इतनी कि हर कदम उठाना एक नयी चुनौती लगने लगती है |खुदा और इंसानों में शायद सबसे बड़ा फर्क यही है कि इंसान ढोने के आदी होते हैं और ढोते रहते हैं,और वहीं खुदा ऐसा कुछ नहीं करता |अपने ही बनाये इंसानों से वो इतना प्यार नहीं करता कि जब उनका वक्त आये तो उनको अपने पास वापस न बुला सके |बुरा तो उसको भी लगता होगा जब किसी इंसान के दिल की धड़कन वो कभी भी रोक देता है | लेकिन आखिर हैं तो खुदा ही, आदत नहीं न उसको प्यार करने की |

1 comment:

neema said...

This is my favorite article, i luv it and i have seen new side of ur writing. I have never imagine that anyone can write article on habits,, its too different thinking but habit is an essential part of life.. i luv this article dear.