आज वक्त काट रहा हूँ कुछ खास होने के इन्तज़ार में | मज़े की बात तो यह, कि मालूम भी नहीं कि आखिर किस चीज़ के लिए वक्त काट रहा हूँ |पर ऐसा अक्सर होता है जब मैं इसी तरह वक्त को काटता रहता हूँ,कुछ खास होने के इन्तज़ार में | न मालूम मेरे जैसे कितने हैं, जो कि बस इन्तज़ार में वक्त काटते जा रहे हैं कुछ खास होने के |पर उनमें से असल में हैं कितने, जिनको वो कुछ खास मिल भी पाता है, यह कोई नहीं बता सकता |हम सब कुछ खास होने के इन्तज़ार में शायद अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बिता देते हैं और धीरे धीरे हमारी उम्मीद इस कदर बढ़ जाती है की जब आखिरकार वो खास मौका या मौके आते भी हैं तो हम उनको पहचान तक नहीं पाते, क्यूंकि हम तो किसी बहुत बड़े वाक्ये की उम्मीद में होते हैं | ऐसा भी नहीं कि ऐसे खास मौके बेहद कम आते हैं | यह खास मौके वक्त वक्त पर हमारे सामने आते रहते हैं |इनके रूप हर बार अलग ज़रूर हो सकते हैं लेकिन यह आते ज़रूर हैं |पैदाइश से लेकर बड़े होने तक हम लोग जिंदगी में कुछ इस कदर उलझ चुके होते हैं की खुशी और गम के बीच सिर्फ एक बाल बराबर की दूरी ही महसूस करने लगते हैं | इसलिए कब खुश और कब दुखी होते हैं यह हम खुद ही नहीं समझ पाते | एक अजीब सी खीज रहती है दिमाग में हर वक्त |खीज अपने दिमाग में खुशियों और ग़मों के बीच लगातार चलते द्वन्द्ध में किसी एक के जीत जाने के इन्तज़ार में |और इस खीज में हम बीत रहा वक्त भी गवां बैठते हैं |शायद हम भूल जाते हैं कि अभी अभी जो एक पल निकला उसमें कितनी खुशियाँ थी |लेकिन हम तो इतने उलझे होते हैं अपनी ही बुनी उलझनों में कि होश ही नहीं होता कि क्या कुछ खो दिया इस एक लम्हें में हमने |अट्ठाईस साल की जी हुई जिंदगी को बहुत लंबा तो नहीं कहूँगा लेकिन इतने सालों में इतना ज़रूर समझ में आने लगा है की ऊपर वाले नें हर एक पल में कुछ खुशियाँ और कुछ गम छिपा कर भेजे हैं |वो बिना रुके ऐसे लम्हें भेजता रहता है |पर यह फैसला करने का हक भी हमपर छोड़ देता है कि हमें उसमें से खुशियाँ चाहिए या गम |अल्लाह हमपर और उसकी दी हुई अक्ल पर बेहद भरोसा करता है | इसलिए उम्मीद करता है कि हम ग़मों के पुलिंदे में से खुशियों के रेशे खुद ही ढूंढ लेंगे | लेकिन हम इंसान हर बार, वक्त बेवक्त उसका सिर शर्म से नीचे झुकाते रहते हैं |बार बार ग़मों को गले से लगा कर खुदा के सामने ही हाथ फैला कर खड़े हो जाते हैं |एक बार खुद को खुदा की जगह रखकर तो देखिये | कितना बुरा लगता होगा उसे जब देखता होगा कि उसकी दी हुई अक्ल को इस कदर ज़ाया कर रहे हैं |हाँ यह बात सही है कि यह बात जितनी कहने में आसान लगती है उससे कहीं ज्यादा मुश्किल असल जिंदगी में अपनाने में होती है |पर यह मुश्किल सिर्फ इसीलिए होती है क्यूंकि हमें ग़मों के साथ जीने की आदत पड़ चुकी होती है या यूं कहिये मज़ा आने लगता है |खुशी आती भी है तो बस इसी डर से खुश नहीं हो पाते हम, क्यूंकि फिर से आने वाले ग़मों को झेलना होगा |
खुश रहना एक कला के सामान है| एक ऐसी कला जिसमें निपुणता बेहद मुश्किल से ही मिलती है | लोग पूरी पूरी जिंदगी भी बिता देते हैं तब भी इसमें महारथ हासिल नहीं कर पाते |पर इसमें पारंगत न हो पाने का सारा दोष अपने आप को ही देना गलत होगा | असल में इसकी एक बहुत बड़ी वजह हमारे आस पास के लोग और यह समाज है जिसका हिस्सा हम चाहते या न चाहते हुए भी हैं बन जाते हैं |औरों को क्या, अपने आप से शुरुआत कर लें |अव्वल तो हर वक्त खुश रहने वाला इंसान आपको ढूंढें नहीं मिलेगा,मिल भी गया तो हमारी बिना उसे जाने हुए भी उसके बारे में एक खराब धारणा ज़रूर बन जायेगी |हमें येही लगेगा की शायद वोह इंसान जिन्दगी को संजीदगी से लेता ही नहीं |शायद वोह आवारा है, शायद वो अभी भी एक बच्चा है, कोई बड़ी बात नहीं की हम उसको बेशर्म भी मान लें |और यह सब इसलिए क्यूंकि वोह हर वक्त खुश रहता है |क्या यह वाकई इतनी बड़ी गलती है ?क्या ऊपर वाले की दी हुई ताकत का हम खुल कर इस्तेमाल भी नहीं कर सकते |क्या बिगाड़ा है हमने उन लोगों का जो बिना हमें ठीक से जाने हुए भी अपनी अदालत में हमें सजा सुना देते हैं ?ये बात सही है की अक्सर खुश रहने वाले इंसान खुशी को पाने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं | कुछ मैखाने में अपना घर बना लेते हैं, कुछ धुएं के बादल में खुद को छिपा लेते हैं, कुछ खुद को दुनिया से ही काट लेते हैं, और कुछ दुनियादारी में इतना ज्यादा पड़ जाते हैं की औरों की जिंदगियां खराब करने में ही खुशी महसूस करने लगते हैं | लेकिन वोह यह नहीं जानते की ऊपर वाला सब देखता है |और जब वोह ऐसा करते हुए किसी को देखता है तो वोह उससे ग़मों और खुशियों में किसी एक को चुनने का फैसला लेने की ताकत ही छीन लेता है |खुशियाँ हमारे आस पास ही बिखरी हुई हैं,उनको ढूँढने के लिए सिर्फ एक पैनी नज़र चाहिए |और वोह नज़र हम सबके पास है,बस ज़रूरत है भीड़ से कुछ अलग सोच रखने की और मान लेने की, की इन्तेज़ार मिथ्या है और बीत रहा लम्हा एक हकीकत |
1 comment:
I completely agree with you, life is full of surprises, depends on individual's perspective towards it. If one can live and enjoy every moment of life as it comes, life would be beautiful and amazing.
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