अपने ही अक्स से नज़रें बचाना चाहता हूँ मैं
वादों की बेजान लाशों पर आंसू बहाना चाहता हूँ मैं बेख़ौफ़ था दिल यह मेरा एक ज़माने पहले कभी
अब दिल धडकने की आवाज़ भर से काँपता हूँ मैं
ए खुदा तूने तो दुआ मेरी कबूली थी कभी
दुआ न सही, सांस लेने की इजाज़त मांगता हूँ मैं
बीती यादों के कफ़न से ढँक लिया था खुद को मैंने
दफ़न हो जाने को एक कब्र अब मांगता हूँ मैं
सजा सी ज़िन्दगी काटना मुझे कब नागवार था
अपनी रूह की रिहाई की मन्नत अब मांगता हूँ मैं
पल भर में मौत देना मुनासिब नहीं समझता है वो
रोज़ मौत देने में थोड़ी रियायत मांगता हूँ मैं