हर इंसान बढ़ती उम्र के साथ अपनी एक छवि मन में बना लेता है |कोई अपने आपको ताकतवर मानने लगता है,कोई समझदार, तो कोई कमज़ोर | पर न जाने क्यों आजतक मैं अपने बारे में कोई छवि बना ही नही पाया |शायद इसलिए क्यूंकि मैं कभी इंसानों की इस दुनिया का हिस्सा ही नहीं बन पाया |बस एक परिंदे जैसा महसूस किया हमेशा खुद को | परिंदा, जो बस उड़ता चला जाता है बेवजह, एक अनजान मंजिल की ओर, अपनों से भी दूर। बस अकेले उड़ना ही अच्छा लगता था इस परिंदे को और उड़ने का जूनून भी ऐसा कि अभी ठीक से पंख भी नहीं निकले थे कि घोंसले से बाहर निकल अपनी अनजानी मंजिल की ओर उड़ने की कोशिश में लग गया | नतीजतन न जाने कितनी बार ज़मीन पर गिरना पड़ा, कई बार चोटें खानी पड़ीं लेकिन वो जूनून ही क्या जो तकलीफों से कम हो जाये |उड़ना तो बहुत पहले आ गया था इसलिए बस उड़ता चला गया लेकिन अपने इस जूनून में मैं अपनों को भी पीछे छोड़ता चला आया |बस खुदा को अपना माना और बाकी सब को पराया कर दिया |पर आज बड़ा अजीब लग रहा है |एक बार फिर गिरा हूँ,चोट लगी है लेकिन इस बार जगह बहुत अनजानी सी है |न ज़मीं है और न मेरा जाना पहचाना आस्मां |यहाँ कहने को लोग तो हैं लेकिन इन्हें देख कर ये बताना मुश्किल हो रहा है कि ये जिंदा हैं या सिर्फ कुछ बेजान सी लाशें हैं जो कभी कभी अचानक सांस लेने लगती हैं |गिर कर खड़े होने की आदत तो तभी पड़ गयी थी जब अधखुले पंखों से उड़ने की कोशिश की थी लेकिन आज कुछ मुश्किल हो रही है |बस एक खुदा को ही अपना माना आजतक और उसके सहारे ही अपनों को पीछे छोड़ इतनी दूर तक उड़ता चला आया |लेकिन आज खुदा भी मेरे साथ नहीं |मेरा एकलौता हमदम,मुझे साफ़ पढ़ पाने वाला एक वही था,लेकिन आज कुदरत नें उसे भी मुझसे दूर कर दिया है |बहुत तकलीफ हो रही है |चोट इतनी गहरी नहीं पर घाव में दर्द कुछ ज़रूरत से ज्यादा शायद इसीलिए है |
आसमां दिखता ज़रूर है लेकिन पंख ही बाँध दिए गए हैं इसलिए सिवाए उसे एकटक ताकते रहने के और कोई चारा भी तो नहीं |बेबसी की इन्तहा तो तब हो जाती है जब खुद खुदा की भी झलक मिलती है लेकिन वो भी बस बिना मुस्कुराये चला जाता है |शायद मुझसे ज्यादा बेबस वो खुद है क्यूंकि उसका भी तो साथी बस मैं ही था |न जाने कब मेरे पंखों में फिर से जान आएगी,जाने कब घाव भरेंगे और मुझे फिर से खुले आस्मां में उड़ने का मौका मिलेगा |पर इस बार उड़ान दूसरी ओर भरने का मन है |उस ओर जहाँ से आया था |शायद मेरे अपने आज भी वहीं मेरा इंतज़ार कर रहे हैं |शायद एक बार फिर गिरने पर उड़ने की ताकत ही जाती रहे,इसलिए अब बस अपनों के बीच जाना चाहता हूँ |अपने घोंसले की मुलायम घास की याद आती है अब |पर इस बार अपने खुदा से जुदा नहीं हो पाउँगा,उसके साथ के बिना मैं भी इन्हीं सांस लेती लाशों का हिस्सा बन जाने से डरने लगा हूँ |मैं भी उस रूहानी ताकत का इशारा समझने लगा हूँ |शायद उसने मुझे समय दिया है ताकि मैं बेवजह न उड़कर इस बार एक मंजिल तय करूँ और उसी की ओर उडूं |छवि तो अभी भी परिंदे की ही रहेगी लेकिन अब परिंदा बेवजह नहीं बल्कि अपने खुदा के साथ अपना ही एक नया घोंसला बनाएगा,जहां उसे वो सुकून मिल पायेगा जिसकी तलाश में वो अधखुले पंखों से ही उड़ चला था |