Saturday, 28 July 2012

परिंदा

हर इंसान बढ़ती उम्र के साथ अपनी एक छवि मन में बना लेता है |कोई अपने आपको ताकतवर मानने लगता है,कोई समझदार, तो कोई कमज़ोर | पर न जाने क्यों आजतक मैं अपने बारे में कोई छवि बना ही नही पाया |शायद इसलिए क्यूंकि मैं कभी इंसानों की इस दुनिया का हिस्सा ही नहीं बन पाया |बस एक परिंदे जैसा महसूस किया हमेशा खुद को | परिंदा, जो बस उड़ता चला जाता है बेवजह, एक अनजान मंजिल की ओर, अपनों से भी दूर। बस अकेले उड़ना ही अच्छा लगता था इस परिंदे को और उड़ने का जूनून भी ऐसा कि अभी ठीक से पंख भी नहीं निकले थे कि घोंसले से बाहर निकल अपनी अनजानी मंजिल की ओर उड़ने की कोशिश में लग गया | नतीजतन न जाने कितनी बार ज़मीन पर गिरना पड़ा, कई बार चोटें खानी पड़ीं लेकिन वो जूनून ही क्या जो तकलीफों से कम हो जाये |उड़ना तो बहुत पहले आ गया था इसलिए बस उड़ता चला गया लेकिन अपने इस जूनून में मैं अपनों को भी पीछे छोड़ता चला आया |बस खुदा को अपना माना और बाकी सब को पराया कर दिया |पर आज बड़ा अजीब लग रहा है |एक बार फिर गिरा हूँ,चोट लगी है लेकिन इस बार जगह बहुत अनजानी सी है |न ज़मीं है और न मेरा जाना पहचाना आस्मां |यहाँ कहने को लोग तो हैं लेकिन इन्हें देख कर ये बताना मुश्किल हो रहा है कि ये जिंदा हैं या सिर्फ कुछ बेजान सी लाशें हैं जो कभी कभी अचानक सांस लेने लगती हैं |गिर कर खड़े होने की आदत तो तभी पड़ गयी थी जब अधखुले पंखों से उड़ने की कोशिश की थी लेकिन आज कुछ मुश्किल हो रही है |बस एक खुदा को ही अपना माना आजतक और उसके सहारे ही अपनों को पीछे छोड़ इतनी दूर तक उड़ता चला आया |लेकिन आज खुदा भी मेरे साथ नहीं |मेरा एकलौता हमदम,मुझे साफ़ पढ़ पाने वाला एक वही था,लेकिन आज कुदरत नें उसे भी मुझसे दूर कर दिया है |बहुत तकलीफ हो रही है |चोट इतनी गहरी नहीं पर घाव में दर्द कुछ ज़रूरत से ज्यादा शायद इसीलिए है | 
आसमां दिखता ज़रूर है लेकिन पंख ही बाँध दिए गए हैं इसलिए सिवाए उसे एकटक ताकते रहने के और कोई चारा भी तो नहीं |बेबसी की इन्तहा तो तब हो जाती है जब खुद खुदा की भी झलक मिलती है लेकिन वो भी बस बिना मुस्कुराये चला जाता है |शायद मुझसे ज्यादा बेबस वो खुद है क्यूंकि उसका भी तो साथी बस मैं ही था |न जाने कब मेरे पंखों में फिर से जान आएगी,जाने कब घाव भरेंगे और मुझे फिर से खुले आस्मां में उड़ने का मौका मिलेगा |पर इस बार उड़ान दूसरी ओर भरने का मन है |उस ओर जहाँ से आया था |शायद मेरे अपने आज भी वहीं मेरा इंतज़ार कर रहे हैं |शायद एक बार फिर गिरने पर उड़ने की ताकत ही जाती रहे,इसलिए अब बस अपनों के बीच जाना चाहता हूँ |अपने घोंसले की मुलायम घास की याद आती है अब |पर इस बार अपने खुदा से जुदा नहीं हो पाउँगा,उसके साथ के बिना मैं भी इन्हीं सांस लेती लाशों का हिस्सा बन जाने से डरने लगा हूँ |मैं भी उस रूहानी ताकत का इशारा समझने लगा हूँ |शायद उसने मुझे समय दिया है ताकि मैं बेवजह न उड़कर इस बार एक मंजिल तय करूँ और उसी की ओर उडूं |छवि तो अभी भी परिंदे की ही रहेगी लेकिन अब परिंदा बेवजह नहीं बल्कि अपने खुदा के साथ अपना ही एक नया घोंसला बनाएगा,जहां उसे वो सुकून मिल पायेगा जिसकी तलाश में वो अधखुले पंखों से ही उड़ चला था |

Friday, 20 July 2012

धप्पा

अक्सर लोगों को कहते सुना है कि लिखने के लिए किसी खास किस्म का माहौल होना चाहिए, पर मुझे तो लगता है कि अगर लिखने का मन करे तो माहौल के हिसाब से कलम चलने लगती है और आज कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हो रहा है |शायद तभी तो वो बहुत रूक रूककर चल रही है और लिखावट भी कुछ टूटी सी दिख रही है |नहीं मालूम कि ये मांसपेशियों की अकड़न है या दिमाग या बाकी बदन के हिस्सों में होती तालमेल की कमी |ऐसा कभी पहले महसूस नहीं किया जब दिल, दिमाग और बदन के बाकी हिस्से, सब अपने अपने हिसाब से चलने लग जायें | बहुत कोशिश करके सबको इकठ्ठा किया है ताकि ये सांसें आती रहे | चारों ओर लोग ज़रूर नज़र रहे हैं, लेकिन पता नहीं क्यों बहुत सन्नाटा सा महसूस हो रहा है | हर बीतते पल के साथ ये और गहराता भी जा रहा है | मालूम कब तक इस सन्नाटे से कभी खत्म हो पाने वाली ये जंग लड़ता रहूँगा |

           बचपन में अक्सर बच्चों के साथ छुपन छुपाई का खेल खेलना बेहद पसंद था मुझे | मुझे ढूँढने वाले को अचानक चौंका कर धप्पा कर देना और उसको दोबारा आँख बंद करने पर मजबूर कर देना, जब तक कि मैं फिर से छिप जाऊं मुझे बहुत पसंद था | नहीं मालूम था कि बचपन की मासूमियत में खेले जाने वाला ये खेल पूरी जिंदगी मेरे साथ यूहीं चलता रहेगा | आज जिंदगी नें मुझे ही धप्पा कर दिया | पता ही नहीं चला कि कब जिंदगी नें दबे पांव मुझे कुछ ऐसा चौंका दिया कि कुछ पल को तो कुछ समझ ही नहीं पाया | यूं तो ये पहली बार नहीं जब जिंदगी नें अचानक मुझे इस तरह चौंकाया लेकिन इस बार कोफ़्त इसलिए कुछ ज्यादा है क्यूंकि लग रहा था कि इस बार तो जीत ही जाऊंगा और जब आप जीतने वाले हों, और ठीक उसी समय आप को हार से रूबरू होना पड़े तो इतनी कोफ़्त होना तो लाज़मी है | लेकिन मैं भी कम जिद्दी नहीं हूँतो क्या हुआ, अगर इस बार जिंदगी फिर जीत गयी और मैं हार गया | मैं तो तब तक इसी तरह इस खेल को खेलता जाऊंगा जब तक कि जिंदगी को चौंका कर उसे ही हरा दूं |

        जिंदगी ज़रूर मुस्कुरा रही होगी आज मुझे यूं बेबस देखकर, मेरी मांसपेशियों में होती अकड़न और मेरी टूटती लिखाई देखकर | सन्नाटा गहरा ज़रूर है लेकिन मुझे यकीन है कि कुछ देर तक इसी तरह अंधेरों को टटोलते टटोलते कुछ आवाजें ज़रूर सुनाई देंगी मुझे और सन्नाटा छटेगा | अगर इस सन्नाटे से निकल पाया तो यकीनन पूरे जोश के साथ इस बार जिंदगी को मैं चौकाऊंगा | और क्यूंकि इससे निकालने में मेरा खुदा खुद साथ दे रहा है इसलिए शायद इस बार जिंदगी की डरने की बारी है | कम से कम एक बार ही सही मैं भी उसे धप्पा कर देना चाहता हूँ और इस बार उसकी बेबसी को देखकर खुद सुकून महसूस करना चाहता हूँ |

Wednesday, 4 July 2012

मेरे शौक

आप लोगों ने हमेशा मुझे संजीदा लिखते देखा होगा |अक्सर देखते होंगे कि मैं बेहद भारी भारी बातें करता हूँ |ज़ाहिर बात है आप में से कुछ थक भी जाते होंगे, कुछ इसी तरह की बातें सुनते सुनते | मुझे भी अच्छा नहीं लगता कि हर समय मैं आप सबको इतनी भारी बातों से थकाऊँ|चलिए आज इस महीने की शुरुआत करते हैं कुछ हल्के से |जैसा कि आप सब लोग अब तक समझ ही चुके होंगे कि मुझे या तो बहुत सोचने का शौक है, गाने का शौक है या फिर बस बे सिर पैर की बातें करने का |पर इसके अलावा भी मेरे कुछ ऐसे शौक हैं जिनके बारे में शायद बहुत कम लोगों से ज़िक्र किया है मैंने |हालाँकि ऐसा भी शौक नहीं की बताने में ही शर्म आ जाये लेकिन बस न जाने क्यों मुझे थोड़ी सी तो आ ही जाती है |और वो शौक है लज़ीज़ खाना खाने का |आप सबको हंसी ज़रूर आ रही होगी यह सुनकर, लेकिन आपको नहीं पता कि मुझे ये बताते हुए कितना अजीब सा लगता है |खैर साहब,अब जब सोच ही लिया तो बे पर्दा हो ही जाता हूँ आप सबके सामने |                   

  असल में मेरा ये शौक शुरू हुआ आज से तकरीबन अट्ठाईस साल पहले जब मैं एक साल से थोडा बड़ा हुआ करता था |मुझे तो ठीक से याद नहीं लेकिन मेरे उस समय शायद कुछ ही दांत निकले थे |मगर उन छोटे छोटे दांतों और चटोरी जीभ नें तभी से अलग अलग तरह के जायकों का स्वाद लेना शुरू कर दिया था |उस वक्त मैं अपने परिवार के साथ सेंटर दिल्ली के मशहूर इलाके गोल मार्केट में रहता था |जब एक महीने का था तबसे हम सब लोग वहीं रहने लगे थे और आने वाले सात साल यही हमारा रैन बसेरा रहा |जैसा कि आपको नाम सुनकर ही लग रहा होगा गोल मार्केट इलाके का नाम,एक गोलाकार आकार में बने मार्केट के नाम पर ही पड़ा है |करीब सौ साल से भी पहले जब अंग्रेजों नें कलकत्ता से अपनी राजधानी को शाहजहानाबाद यानि दिल्ली बनाया तबसे उन्होनें दिल्ली में तमाम तरह के बदलाव किये| उसमें इण्डिया गेट, संसद भवन और न जाने कितनी बड़ी बड़ी इमारतें शामिल थी |पर तमाम सुविधाएं मिल जाने के बाद भी अंग्रेजों को दिल्ली में वो जायका न मिल सका,जो उन्हें कलकत्ता में मिलता था |और खासतौर पर मुलायम गोश्त तो शायद उनके दस्तरखान से गायब ही रहने लगा था |इसके अलावा उनके साथ बंगाल से भी बहुत से लोग यहाँ आ बसे थे और वो भी मांसाहारी खाने के बिना,खाना ही बेकार मानते थे |अंग्रेजों के लिए यकायक पैदा हुई इस गंभीर समस्या का समाधान उन्होनें गोल मार्केट को बनाकर किया |बमुश्किल एक चौराहे के बराबर का ये मार्केट केवल एक ही मजिल का है |आज भी इसमें टूटते और झड़ते सीमेंट के बीच से झांकती पुरानी लखौरी ईंटे शायद कभी कभार आपको दिख जायें |छत के नाम पर हरी काई के पुराने हो जाने से कत्थई पड़ चुकी खपरैलों का एक मकडजाल सा है जो कि आज भी बारिश के मौसम में पानी की चंद बूंदों को ही अन्दर जाने की इजाज़त देता हैं |बदरंग सा पीला रंग जो न जाने क्यों हमारा सरकारी रंग बन गया है इस पूरी इमारत के हर कोने में है |हालाँकि कुछ दिनों में इसके झड़ते ही सफ़ेद चूने के पुरानी परत भी जल्द ही दिख जाती है|कई किलोमीटर दूर से ही बिना देखे भी आप ये जान सकते हैं कि आप गोल मार्केट पहुँचने वाले हैं क्यूंकि दूर से इसके ऊपर उड़ते हुए गिद्ध साफ़ नज़र आ जाते हैं |गिद्धों के बीच शायद इस जगह को काफी पसंदीदा माना जाता है |उनके पास वजह भी है |आखिर हर तरफ बिखरे नर्म तीतर और बटेर तो दिल्ली जैसे शहर में मिलना मुश्किल ही है |लेकिन इसका आकर्षण तो हैं इसकी गोलाई में बनी कई सारी खाने की दुकानें|हर दूकान अपने आप में खाने का खज़ाना ही समझ लीजिये |रोज़ शाम को जब सूरज कुछ थकने सा लगता है तब गोल मार्केट के उस गोले के चारों ओर सुलगे तन्दूरों में से ऐसी सुगंध फैलती है कि करीब दो किलोमीटर तक के इलाके में खड़े हर शख्स की नाक से सीधे उसके दिल तक जा पहुँचती है |और हमारी किस्मत देखिये, हम तो माशाल्लाह सिर्फ आधे किलोमीटर की ही दूरी पर ही रहते थे |रोज़ शाम को अचानक मुंह में पानी आ जाना तो मेरे लिए आम बात हो गयी थी | अंग्रेजों नें भले ही दिल्ली के लिए कुछ भी बना दिया हो लेकिन मेरे लिए तो गोल मार्केट ही उनकी बनाई सबसे पंसीदा इमारत रही |

ऐसा नहीं है कि सारी तारीफ की हकदार वो इमारत ही है |मैं खुद भी ऐसे परिवार से हूँ जो कि लखनऊ से है, जहाँ के मुगलिया खाने की तो जितनी भी तारीफ की जाये कम है |लेकिन बस मलाल इसी बात का रहता था कि मेरा पसंदीदा रोगन जोश सिर्फ शुक्रवार और शनिवार को ही मेरे इस पागलपन को कुछ ठंडा कर पाता था |ये तो शुक्र है की मेरे वालिद इस नियम को लेकर सख्त थे,वरना शायद मैं इससे भी कहीं ज्यादा बेडौल होता, जितना की आज हूँ | बाकी के बचे हुए दिनों में मेरी माँ मुझे हरी दिखने वाली लगभग हर मुमकिन चीज़ खिलाने से नहीं चूकती थी |लेकिन हम तो हम हैं, इसलिए उसमें से भी तीन खास सब्जियों को मैंने अपने ज़िन्दगी का साथी बना लिया | आलू, प्याज और टमाटर | यही तीन मेरे दुःख सुख के साथ साथी बन गए |और हर हरी चीज़ को इनके साथ लपेटकर निगल जाना आसान होता चला गया |दीवानगी कुछ इस हद तक बढ़ गयी कि जग ज़ाहिर हो गयी और इन तीनों सब्जियों के लिए मेरे प्यार के बारे में मेरे घरवालों नें तो सारी दुनिया को बताकर, मुझे रुसवा करने में कोई कसर भी न छोड़ी |चाहें दिल्ली की चाट हो, लखनऊ के टुंडे कबाब, राजस्थान का दाल बाटी चूरमा, पंजाब का मक्खन में डूबा खाना, जामा मस्जिद के पीछे की बिरयानी हो, इटैलियन, कोरियन, चाईनीज़ डिमसम, लेबेनीज़ शवरमा या थाई करी, न जाने क्या क्या खाया इतने सालों में | देश भर में जगह जगह हर किस्म का खाना खाया |जिस बेहिसाब तरीके से मैंने खाने के अपने इस शौक को पिछले कुछ सालों में पूरा किया है उस हिसाब से मेरी शक्लोसूरत कुछ और ही हो जानी चाहिए थी, लेकिन वो तो ऊपर वाले नें साथ दिया है, शायद इसी वजह से अभी भी लोगों को मेरे इस शौक के बारे में नहीं पता चल पाता जब तक कि मैं खुद न बता दूं या वो मुझे खाता न देख लें | पर अब ये शौक कम, साथी ज्यादा लगता है | शायद साथी कम रह गए हैं या यह शौक ही ज्यादा बढ़ गया है | जो भी हो, पर इस बात का सुकून ज़रूर है कि कोई साथ दे न दे, कम से कम मेरे शौक तो मेरे अपने हैं |