Wednesday, 20 June 2012

तन्हा

कुछ ऐसा पढ़ा जो खुद से जुड़ा सा लगा | आप सबसे बाँट रहा हूँ | शायद आप भी खुद को जोड़ पाएं इन अल्फाजों से -

जिंदगी यूं ही हुई बसर तन्हा
काफिला साथ और सफ़र तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती है बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा

1 comment:

neema said...

Zindagi ko yu na banao tanha,
ki addat pad jaye raheni kie tanha.