आज रवि-वार है यानि मेरा दिन। लेकिन विडम्बना देखिए,आज जब आप अपने अपने घरों में देर तक सोने का लुत्फ़ उठा रहे होंगे, मैं तड़के सुबह से अपने ऑफिस में खबरें तलाश रहा हूँ | यह है टी.वी की दुनिया जहाँ छुट्टी के बारे में बात करते ही आपके ऑफिस वाले आपको कुछ यूं देखने लगेंगे मानों कि उन्होनें कोई भूत देख लिया हो |खैर,अब किसी को इसका दोष तो दे नहीं सकता क्यूंकि यह भली भांति जानते हुए मैंने एक टी.वी पत्रकार बनने का फैसला लिया था कि यहाँ छुट्टी जैसे शब्द को कोई ज्यादा तवज्जो नहीं देता |वैसे मुझे पूरा यकीन है कि आपमें से कई लोग इस फील्ड के बारे में केवल एक सुन्दर चेहरे के जो कि खबरें पढ़ती या पढता है, और कुछ नहीं जानते होंगे | आपकी गलती नहीं | असल में जो दिखता है वही समझ भी आता है |अब जब हर न्यूज़ चैनल पर केवल एक ही इंसान हर वक्त ख़बरों का विश्लेषण करते नज़र आयेगा तो आप को कैसा पता चलेगा की उसके पीछे दरअसल पूरी की पूरी फ़ौज काम कर रही होती है |जी हाँ पूरी फ़ौज |खबर के पैदा होने से उसे आप तक पहुचने के बीच वो यहाँ इतने लोगों से गुज़रती है कि आप तक पहुचाते पहुचाते तो हमारे लिए यह खबर ही नहीं रह जाती |और इस पूरी कड़ी में मेरी भूमिका कुछ ऐसी है जैसी तलवार की धार पर चलना |ऐसा इसलिए क्यूंकि हर खबर पहले मेरे ही पास आती है और उसकेसाथ कैसा सुलूक करना है यह मुझपर ही निर्भर करता है | साथ ही कान और आँख खुले रखने पड़ते हैं हर खबर के लिए |इसमें ज़रा सी चूक का असर बहुत भारी पड़ सकता है मसलन अगर मुझे यह पता चले की किसी सड़क दुर्घटना में चार लोगों की मौत होगयी और दो घायल हैं, पर किसी कारण वश ध्यान न देने के कारण मैं उसे दो लोगों की मौत और चार लोगों के घायल होने के तौर पर आगे जाने दूं तो पूरे हिंदुस्तान में जहाँ आप यह चैनल देख रहे होंगे वहाँ वहाँ यह गलत खबर पहुँच चुकी होगी |यानी 121करोड़ भारतियों को सही जानकारी देने की ज़िम्मेदारी मेरे कन्धों पर है |
इतनी ज़िम्मेदारी मिलना अच्छा भी लगता है और कभी कभी खीज भी होती है | खीज इसलिए क्यूंकि दुनिया भर के लोग बस यह मान कर बैठ जातेहैं की मैं हर वक्तयही काम कर रहा हूँ |अभी दो तीन दिन पहले का ही वाकया ले लीजिए |रात के तीन बजेमुझे उत्तर प्रदेश के सुदूर क्षेत्र बहराइच के रिपोर्टर नें अचानक फोन कर दिया | मैंने लगभग बेहोशी की हालत में फोन उठाया और उधर से आवाज़ आई “सर प्रणाम, ताहिर बोल रहे हैं बहराइच से” | कुछ पलों के लिए तो मुझे लगा की शायद मैं कोई सपना देख रहा हूँ |अभी ठीक से इस सपने और हकीकत के बीच के हेरफेर को मैं समझा तक नहीं थाकि दोबारा आवाज़ आई “सर सो तो नहीं रहे थे आप?”|खैर तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि हाँ यह वाकई हकीकत हैकि कोई मुझसे तीन बजे रात को फोन कर यह पूछ रहा है कि कहीं मैं सो तो नहीं रहा था | इंतहाई गुस्से की हालत में मैं सिर्फ “बोलो” के आगे और कुछ न कह पाया |तब ताहिर नें कहा “सर दो गाडियां भीड़ गयी है हाईवे पर,दो मरे हैं,एक औरत भी है हास्पिटल में,पर पक्का मर जायेगी सर”|इससे पहले मैं और कुछ कह पाता ताहिर नें फिर कहा “सर तो मैं फुटेज भेजू“? बदकिस्मती यह कि बेहोशी से होश में आने के तुरंत बाद मिली ऐसी खबर के बारे में फैसला लेना भी ज़रूरी था |क्यूंकि ऐसी छोटी जगहों पर हर कहानी के हिसाब ऐसे टेम्परेरी रिपोर्टरों को पैसे दिये जाते हैं |आखिरकार मैंने सिर्फ यह खबर सिर्फ एक फ्लैश के तौर पर चलवाना बेहतर समझा क्यूंकि फुटेज के 'लायक' इसमें कुछ कमाल का नहीं था और ताहिर के मुताबिक़ मौके पर से भीड़ चुकी गाडियां भी हट चुकी थी |अब आप कुछ कुछ समझ पा रहे होंगे कि कैसे मुझ जैसे टी.वी पत्रकार चौबीस घंटे ड्यूटी पर ही होते हैं |
पर मुझे इस से कोई शिकायत नहीं |आखिर पत्रकारिता हमेशा से मेरा जूनून रहा है और जूनून के आगे तो सब कुछ बौना हो जाता है |अच्छा लगता है जब कोई भी खबर दुनिया में सबसे पहले मेरे ही पास आती है |पर यह बात सही है कि इस तरह के हट के पेशे से जुड़ने के जूनून नें आप लोगों कि तरह एक नियंत्रित जीवन न जी सकने पर मुझे मजबूर कर दिया है |उम्मीद है किसी रविवार की सुबह मैं भी आप लोगों कि तरह देर तक सोऊंगा और दिन और रात के फर्क को देख ही नहीं, महसूस भी कर पाउँगा |
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