कुछ वक्त बाद आज लिख पा रहा हूँ |कभी दिमाग नें साथ दिया तो हाथों नें नहीं, और कभी हाथों नें दिया तो दिमाग नें ही चलने से इनकार कर दिया |खैर जैसे तैसे आज दोनों को ही रज़ामंद कर लिया है दिल के गुबार को कागज पर निकाल देने के लिए |न जाने क्यों ऐसा हो जाता है कि कभी कभी अपने ही बदन के हिस्सों पर खुद का ही काबू नहीं रह जाता |‘क्यों’, कितना छोटा सा शब्द है न?पर देखने में छोटे से लगने वाले इस शब्द का भार बाकी सभी शब्दों से कहीं ज्यादा है |क्यूंकि अक्सर इसके इस्तेमाल के बाद शून्य दिखता है,और इस ‘क्यों’ का जवाब हममें से किसी के पास भी नहीं होता |मेरी तरह आप में से बहुत से लोग होंगे जो सिर्फ ये शब्द अपनी अपनी जिंदगियों के किसी भी चुने हुए पहलू से जोड़ने पर,जवाब में कुछ ऐसा ही सन्नाटा पाते होंगे जैसा अक्सर मैं पाता हूँ |पर मैंने कभी हार नहीं मानी और ता उम्र हमेशा इस ‘क्यों’का जवाब तलाशने की कोशिश की,लेकिन अब थकान होने लगी है |अब मन नहीं करता कि अँधेरे में बस बेतहाशा इसके पीछे भागता जाऊं |देर से ही सही लेकिन समझ आने लगा है कि जिंदगी के हर पहलू में ‘क्यों’को नहीं जोड़ा जा सकता |जिंदगी में बहुत कुछ ‘क्यों’ के परे होता है, सही और गलत के परे होता है |
देर से ही सही लेकिन अब सही और गलत के पार की उस दुनिया का मैं भी एक हिस्सा बन गया हूँ |अजीब सा सुकून है यहाँ |यहाँ हर वक्त 'क्यों' का खौफ नहीं है |वक्त बेवक्त पर पूछे जाने वाले सवालों की लंबी फेहरिस्त नहीं है |यहाँ बस मुस्कराहट है जो कब आ जाती है,यह खुद को भी पता नहीं चलता |कभी कभी मलाल भी होता है कि पहले ही ये रास्ता किसी नें सुझा दिया होता तो सही और गलत के पार की इस दुनिया से मैं भी कहीं पहले लुत्फंदोज़ हो पाता |हालाँकि आदत से मजबूर होने की वजह अक्सर फिर से ‘क्यों’का जवाब ढूँढने का मन ज़रूर होता है, लेकिन फिर सही और गलत के पार होने की खुशी से यह ढँक जाता है |मैं किस्मत वाला ही कहूँगा खुद को कि मुझे ऐसे फरिश्तों का साथ मिला है जिसकी बदौलत मैं भी ‘क्यों’के इस बंधन से आज़ाद हो पाया हूँ |लेकिन आपमें से शायद बहुत से ऐसे लोग जिनके पास ऐसे फरिश्तों की कमी है,उनको यह ज़रूर कहूँगा कि एक बार के लिए ‘क्यों’का जवाब ढूंढें बिना,सही और गलत के परे इस दुनिया में आकर तो देखिये |शायद आप खुद को कहता पाएंगे की “अब वापस ही ‘क्यों’ जाया जाये” |
देर से ही सही लेकिन अब सही और गलत के पार की उस दुनिया का मैं भी एक हिस्सा बन गया हूँ |अजीब सा सुकून है यहाँ |यहाँ हर वक्त 'क्यों' का खौफ नहीं है |वक्त बेवक्त पर पूछे जाने वाले सवालों की लंबी फेहरिस्त नहीं है |यहाँ बस मुस्कराहट है जो कब आ जाती है,यह खुद को भी पता नहीं चलता |कभी कभी मलाल भी होता है कि पहले ही ये रास्ता किसी नें सुझा दिया होता तो सही और गलत के पार की इस दुनिया से मैं भी कहीं पहले लुत्फंदोज़ हो पाता |हालाँकि आदत से मजबूर होने की वजह अक्सर फिर से ‘क्यों’का जवाब ढूँढने का मन ज़रूर होता है, लेकिन फिर सही और गलत के पार होने की खुशी से यह ढँक जाता है |मैं किस्मत वाला ही कहूँगा खुद को कि मुझे ऐसे फरिश्तों का साथ मिला है जिसकी बदौलत मैं भी ‘क्यों’के इस बंधन से आज़ाद हो पाया हूँ |लेकिन आपमें से शायद बहुत से ऐसे लोग जिनके पास ऐसे फरिश्तों की कमी है,उनको यह ज़रूर कहूँगा कि एक बार के लिए ‘क्यों’का जवाब ढूंढें बिना,सही और गलत के परे इस दुनिया में आकर तो देखिये |शायद आप खुद को कहता पाएंगे की “अब वापस ही ‘क्यों’ जाया जाये” |
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