Saturday, 30 June 2012

बचपन

कुछ देर से पास खेलते हुए एक बच्चे को देख रहा हूँ|मेरा बेमकसद बैठे रहने का मन कहिये या उस प्यारे से बच्चे की मासूमियत में एक अजीब सा खिंचाव,कि पिछले एक घंटे में उसे निहारने के अलावा कुछ और नहीं किया है मैंने |हर छोटे बच्चे की तरह वो भी कुछ न कुछ ऐसा किए जा रहा है जिसको करने की वजह अगर उससे पूछी जाये तो अपने माँ के दामन में जा छिपने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर पायेगा शायद |बचपन की ये सबसे खास बात लगती है मुझे | इसमें कुछ भी करने की वजह नहीं होती | यह आज़ाद होता है |ठीक किसी परिंदे की तरह जो बस बेहिसाब उड़ता चला जाता है जब तक उसका मन चाहे |कभी किसी डाल पर बैठ सुस्ता लेता है,फिर पंख फडफडा एक अंगड़ाई लेता है और कुछ देर में फिर एक बार तैयार हो जाता है उड़ने के लिए |बचपन मासूम ज़रूर है लेकिन जिद्दी भी कम नहीं |जिस चीज़ पर दिल मचल गया बस वही आँखों के सामने छाई रहती है | न कोई मंजिल होती है उसकी, न उसे पाने की जद्दोजेहद | ये बस पेड़ से गिरे उस हलके से मुलायम रूई के फाए की तरह है जो बेवजह इधर से उधर, उड़ता या लुढकता फिरता है |
           
 भले ही आज हम सबकी शक्ल बचपन से कुछ अलग ज़रूर दिखती हो लेकिन चेहरे पर आते हाव भाव आज भी कुछ कुछ वही पुराने हैं | आखिर नींव तो वही है न, जिसपर उम्र की इस इमारत को खड़ा किये जा रहे हैं साल दर साल | मेरा अपना ही बचपन लीजिए, जो आजतक मेरी यादों में ताज़ा है | ये कहना गलत नहीं होगा कि जिंदगी के सफर का सबसे खूबसूरत वक्त रहा है वो |ऐसा क्यों कह रहा हूँ,इस बारे में तो ऊपर की पंक्तियों में ही इतना लिख चुका हूँ कि अब शायद आपको समझाने की ज़रूरत ही नहीं |बस मलाल सिर्फ इस बात का है कि हर अच्छी चीज़ की तरह ये बचपन भी बहुत कम समय के लिए ठहरा |अभी तो ठीक से खुश भी नहीं हो पाए थे कि आया और चला भी गया |कभी कभी लगता है कि आम इंसानों के मुकाबले चौगुनी रफ़्तार से बड़ा हो गया |कम से कम दिखने में तो बड़ा लगने लगा हूँ |उड़ान भरने से पहले घंटों सोचना पड़ता है,और सोच ही सोच में इतना उड़ लेता हूँ कि और उड़ने की हिम्मत ही नहीं रहती |पर दिल के किसी कोने में आज भी मुलायम रूई में ढंका एक बच्चा ज़रूर है जो बड़ों की इस दुनिया से कुछ दूर मायूस सा बैठा दिखाई देता है |

Friday, 29 June 2012

क्यों

कुछ वक्त बाद आज लिख पा रहा हूँ |कभी दिमाग नें साथ दिया तो हाथों नें नहीं, और कभी हाथों नें दिया तो दिमाग नें ही चलने से इनकार कर दिया |खैर जैसे तैसे आज दोनों को ही रज़ामंद कर लिया है दिल के गुबार को कागज पर निकाल देने के लिए |न जाने क्यों ऐसा हो जाता है कि कभी कभी अपने ही बदन के हिस्सों पर खुद का ही काबू नहीं रह जाता |‘क्यों’, कितना छोटा सा शब्द है न?पर देखने में छोटे से लगने वाले इस शब्द का भार बाकी सभी शब्दों से कहीं ज्यादा है |क्यूंकि अक्सर इसके इस्तेमाल के बाद शून्य दिखता है,और इस ‘क्यों’ का जवाब हममें से किसी के पास भी नहीं होता |मेरी तरह आप में से बहुत से लोग होंगे जो सिर्फ ये शब्द अपनी अपनी जिंदगियों के किसी भी चुने हुए पहलू से जोड़ने पर,जवाब में कुछ ऐसा ही सन्नाटा पाते होंगे जैसा अक्सर मैं पाता हूँ |पर मैंने कभी हार नहीं मानी और ता उम्र हमेशा इस ‘क्यों’का जवाब तलाशने की कोशिश की,लेकिन अब थकान होने लगी है |अब मन नहीं करता कि अँधेरे में बस बेतहाशा इसके पीछे भागता जाऊं |देर से ही सही लेकिन समझ आने लगा है कि जिंदगी के हर पहलू में ‘क्यों’को नहीं जोड़ा जा सकता |जिंदगी में बहुत कुछ ‘क्यों’ के परे होता है, सही और गलत के परे होता है |

                देर से ही सही लेकिन अब सही और गलत के पार की उस दुनिया का मैं भी एक हिस्सा बन गया हूँ |अजीब सा सुकून है यहाँ |यहाँ हर वक्त 'क्यों' का खौफ नहीं है |वक्त बेवक्त पर पूछे जाने वाले सवालों की लंबी फेहरिस्त नहीं है |यहाँ बस मुस्कराहट है जो कब आ जाती है,यह खुद को भी पता नहीं चलता |कभी कभी मलाल भी होता है कि पहले ही ये रास्ता किसी नें सुझा दिया होता तो सही और गलत के पार की इस दुनिया से मैं भी कहीं पहले लुत्फंदोज़ हो पाता |हालाँकि आदत से मजबूर होने की वजह अक्सर फिर से ‘क्यों’का जवाब ढूँढने का मन ज़रूर होता है, लेकिन फिर सही और गलत के पार होने की खुशी से यह ढँक जाता है |मैं किस्मत वाला ही कहूँगा खुद को कि मुझे ऐसे फरिश्तों का साथ मिला है जिसकी बदौलत मैं भी ‘क्यों’के इस बंधन से आज़ाद हो पाया हूँ |लेकिन आपमें से शायद बहुत से ऐसे लोग जिनके पास ऐसे फरिश्तों की कमी है,उनको यह ज़रूर कहूँगा कि एक बार के लिए ‘क्यों’का जवाब ढूंढें बिना,सही और गलत के परे इस दुनिया में आकर तो देखिये |शायद आप खुद को कहता पाएंगे की “अब वापस ही ‘क्यों’ जाया जाये” |

Sunday, 24 June 2012

टुकड़े

अचानक अभी आँख खुली |शायद कोई सपना देख रहा था |मैं उन लोगों में से हूँ जो सपने याद नहीं रख पाते |पहले जब यार दोस्त अपने अपने सपनों का ज़िक्र करते, तो बड़ी कोफ़्त होती थी क्यूंकि मेरे पास तो सुनाने को एक भी सपना नहीं होता था |लेकिन धीरे धीरे एहसास हुआ कि अच्छा ही है कि ऊपर वाले नें इतनी याददाश्त ही नहीं दी मुझे कि अपने सपने याद रख सकूं |क्या करूँ याद रख कर ये सपने ?किस काम के हैं ये ?देखना तो आसान है लेकिन जब टूटते हैं तो इतने टुकड़े हो जाते हैं कि चुनकर बीनना तक मुश्किल हो जाता है |नुकसान इतने पर ही रुक जाता तो भी शायद सुकून मिल जाता,लेकिन ये तो ऐसा नुकसान दे जाते हैं कि एक लंबे अरसे तक दुखता रहता है |टूटे सपनों के ये अनगिनत टुकड़े दिल में जा धंसते हैं |अंदर तक घुस जाते है कमबख्त |दिल बेचारा बस यूहीं धड़कता रहता है |कभी सिकुड़ कर, कभी ऐंठ कर, कभी बस कुछ पलों के लिए रुक कर कोशिश करता रहता है इन टुकड़ों के धंसने से उठे दर्द को झेलने की |पर इसकी हर हलचल दिमाग भी तो पढ़ लेता है |ये दिल चाहें इस दर्द को कितना ही छिपा ले,लेकिन ये दिमाग इस दर्द को पूरे बदन में फैला देता है |नसों में बहने लगता है ये दर्द | इतनी हिम्मत कर जाता है कि कभी कभी तो रूह तक छूने की कोशिश करने लगता है |
न जाने क्यों ये दर्द सिर्फ महसूस होता है | इसका कोई और छोर तक भी नहीं दिखता | कोई सिरा नहीं दिखता, नहीं तो इसे वहीं से खींच कर खुद में से निकाल पाता |अब तो आंसू भी थक जाते हैं इसके सिरों को ढूँढने की कोशिश करते करते | जलन सी महसूस होने लगती है आँखों में | लगता है कि अब इन आँखों से दर्द खून के साथ बहने लगेगा | अब तो लगता है दिल ही थम जाये तो शायद ये दर्द कुछ कम हो जायेगा | बाकि सपने याद रहे न रहे, लेकिन अब सिर्फ यही सपना दिखता है कि इस दिल को रोककर,खुद अल्लाह ही दर्द से निजाद दिला दे |उम्मीद करता हूँ कम से कम ये सपना तो नहीं तोडेगा वो मेरा |

Saturday, 23 June 2012

रेशे जिंदगी के

उम्र, बहुत ज्यादा नहीं है मेरी, इसलिए यह तो नहीं कहूँगा कि जिंदगी के बारे में बहुत ज्यादा जानता हूँ लेकिन शायद कुछ हालातों नें, और कुछ आस पास के लोगों नें ही इतना सिखा दिया कि जिंदगी औरों से कुछ ज्यादा ही बेहतर समझ आने लगी |असल में ऊपर वाले नें इसकी बनावट ही इस कदर कुछ खास की है कि जिंदगी के रेशों के इस ताने बाने को समझ पाना हम इंसानों के बस की बात नहीं | न मालूम क्यों, मुझे हमेशा ऐसा लगा है कि जब हम दुनिया में आते हैं तब जिंदगी के यह रेशे दूधिया सफ़ेद रंग के होते हैं |सफ़ेद इसलिए क्यूंकि यह सबसे पाक,सबसे साफ़ और ऊपर वाले का अंश है | लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ती हैं, धीरे धीरे ग़मों और तकलीफों के काले धब्बे इन सफ़ेद रेशों पर पड़ने लगते हैं |कुछ धब्बे ऐसे होते हैं जो बस झाड़ भर लेने से ही बहुत हद तक साफ़ हो जाते हैं लेकिन कुछ धब्बे गाढे होते हैं और उन्हें वक्त से साफ करना पड़ता है | हम सब तो पूरी जिंदगी इन्हीं सफ़ेद रेशों को सफ़ेद बनाये रखने की जद्दोजेहद में निकाल देते हैं |
                     औरों की तरह इन रेशों को यू हीं सफ़ेद रखने की कोशिश करता तो मैं भी था, लेकिन मेरे रेशों में ग़मों के वो काले धब्बे कुछ इस कदर जज़्ब हो गए,कि वक्त से कई बार साफ़ करने के बाद भी बमुश्किल सिर्फ कुछ हद तक ही धुंधले पड़ पाए |इस लगातार साफ़ करने की कोशिश में मेरे रेशे ही इतने कमज़ोर हो गए कि बहुत सी जगहों से उधड़ गए |कुछ अजीब से मटमैले से रंग के दिखने लगे हैं अब|इन रेशों को सफ़ेद रख पाने की कोशिश तो बहुत पहले छोड़ दी थी मैंने, अब तो सिर्फ खुशियों के छोटे छोटे पैबंद इनपर लगा, इन चिथड़ों में बदल चुके रेशों को साथ रखने की कोशिश करता हूँ |

Wednesday, 20 June 2012

तन्हा

कुछ ऐसा पढ़ा जो खुद से जुड़ा सा लगा | आप सबसे बाँट रहा हूँ | शायद आप भी खुद को जोड़ पाएं इन अल्फाजों से -

जिंदगी यूं ही हुई बसर तन्हा
काफिला साथ और सफ़र तन्हा

अपने साये से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा

रात भर बोलते हैं सन्नाटे
रात काटे कोई किधर तन्हा

दिन गुज़रता नहीं है लोगों में
रात होती है बसर तन्हा

हमने दरवाज़े तक तो देखा था
फिर न जाने गए किधर तन्हा

कैफ़ियत

अक्सर शब्द कम पड़ने लगते हैं इसको समझा पाने के लिए, इसलिए कम से कम में ही अपनी कैफ़ियत को बयाँ करने की कोशिश कर रहा हूँ -
जो सुकून के चंद लम्हे लगते हैं
न जाने क्यों, डबडबाई आँखों के साथी बन जाते हैं
सांसें भले ही न रुकें मगर
दिल के कुछ और घाव, ताज़ा ज़रूर हो जाते हैं

Monday, 18 June 2012

डर

शाम हो चली है |दिल कुछ उदास है |न मालूम क्यों,कभी कभी ऐसा महसूस होता है |आप सबके साथ भी होता होगा जब दिल अचानक सिकुड़ने सा लगता है |लगता है किसी ने मुट्ठी में भींच लिया हो |शायद कुछ लोग इसे मनोवैज्ञानिक भाषा में डिप्रेशन कहते हैं,लेकिन मुझे लगता है कि यह बहुत आम बात है |या आजकल आम हो गयी है |अक्सर अच्छे भले खुशी के माहौल में ऐसा महसूस होना अजीब ज़रूर है लेकिन ऐसा नहीं कि यह किसी मानसिक रोग की निशानी है |जितना मैं समझ पाया हूँ,मुझे लगता हूँ कि शायद हम बहुत डरने लगे हैं |अभी ठीक से खुश हो भी नहीं पाते कि हमें एक अजीब सा डर आ घेरता है | डर कुछ बुरा हो जाने का |डर अचानक से खुशी छिन जाने का |कई बार तो कुछ नहीं भी हो रहा होता तब भी डर कि शायद कुछ ठीक नहीं होने वाला |अचानक से ऐसा लगता है जैसे हम किसी अँधेरी खाई में बस गिरते चले जा रहे हों |पेट में एक अजीब सी हौलन उठने लगती है,ठीक वैसे ही जब हम किसी ऊंचे झूले से अचानक नीचे आते हैं |
                   यह डर शायद आम इसलिए हो गया है, क्यूंकि समय इतनी तेज़ी से चल रहा है कि हम सब उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश में हांफने लगे हैं |हर बीतता लम्हा मानो हमसे दौड लगा रहा हो और यह जानते हुए भी कि हम उसके साथ नहीं दौड पा रहे, और तेज़ी से भाग रहा हो |लोग अक्सर कहते हैं कि डर का सामना करके ही उसे हराया जा सकता है |लेकिन इस डर से शायद पार पाना आसान बात नहीं |हो सकता कि मैं हार मान जाता हूँ इसके सामने |जब आपके सामने-सामने हाथ में आई रेत कि तरह सब कुछ छूटता जाये तो शायद ऐसा लगना लाज़मी भी है |लेकिन शायद यह सुन सुनकर नहीं,बल्कि खुद महसूस करके ही सीखा जा सकता है कि रेत को जितना पकड़ो हाथ से उतनी ही निकलती जाती है |मैंने सुना कई बार है,लेकिन समझ ज़रा मुश्किल से ही आया है | तमाम जतन कर लेने के बाद मैंने यह मानकर संतोष ज़रूर कर लिया है कि शायद यह डर आम है |पर सिर्फ यह मान लेने भर से हर बार काम नहीं चलता | न चाहते हुए भी इस डर पर काबिज तो होना ही होगा | नहीं मालूम कि वक्त के साथ इस दौड में उसे कैसे हरा पाउँगा लेकिन अगर हराना है तो दौड़ते तो रहना ही होगा,भले ही इस सिकुड़ते दिल के साथ और न जाने कितनी शामें बितानी पड़ें |  

Sunday, 17 June 2012

एक पत्रकार का रविवार

आज रवि-वार है यानि मेरा दिन। लेकिन विडम्बना देखिए,आज जब आप अपने अपने घरों में देर तक सोने का लुत्फ़ उठा रहे होंगे, मैं तड़के सुबह से अपने ऑफिस में खबरें तलाश रहा हूँ | यह है टी.वी की दुनिया जहाँ छुट्टी के बारे में बात करते ही आपके ऑफिस वाले आपको कुछ यूं देखने लगेंगे मानों कि उन्होनें कोई भूत देख लिया हो |खैर,अब किसी को इसका दोष तो दे नहीं सकता क्यूंकि यह भली भांति जानते हुए मैंने एक टी.वी पत्रकार बनने का फैसला लिया था कि यहाँ छुट्टी जैसे शब्द को कोई ज्यादा तवज्जो नहीं देता |वैसे मुझे पूरा यकीन है कि आपमें से कई लोग इस फील्ड के बारे में केवल एक सुन्दर चेहरे के जो कि खबरें पढ़ती या पढता है, और कुछ नहीं जानते होंगे | आपकी गलती नहीं | असल में जो दिखता है वही समझ भी आता है |अब जब हर न्यूज़ चैनल पर केवल एक ही इंसान हर वक्त ख़बरों का विश्लेषण करते नज़र आयेगा तो आप को कैसा पता चलेगा की उसके पीछे दरअसल पूरी की पूरी फ़ौज काम कर रही होती है |जी हाँ पूरी फ़ौज |खबर के पैदा होने से उसे आप तक पहुचने के बीच वो यहाँ इतने लोगों से गुज़रती है कि आप तक पहुचाते पहुचाते तो हमारे लिए यह खबर ही नहीं रह जाती |और इस पूरी कड़ी में मेरी भूमिका कुछ ऐसी है जैसी तलवार की धार पर चलना |ऐसा इसलिए क्यूंकि हर खबर पहले मेरे ही पास आती है और उसकेसाथ कैसा सुलूक करना है यह मुझपर ही निर्भर करता है | साथ ही कान और आँख खुले रखने पड़ते हैं हर खबर के लिए |इसमें ज़रा सी चूक का असर बहुत भारी पड़ सकता है मसलन अगर मुझे यह पता चले की किसी सड़क दुर्घटना में चार लोगों की मौत होगयी और दो घायल हैं, पर किसी कारण वश ध्यान न देने के कारण मैं उसे दो लोगों की मौत और चार लोगों के घायल होने के तौर पर आगे जाने दूं तो पूरे हिंदुस्तान में जहाँ आप यह चैनल देख रहे होंगे वहाँ वहाँ यह गलत खबर पहुँच चुकी होगी |यानी 121करोड़ भारतियों को सही जानकारी देने की ज़िम्मेदारी मेरे कन्धों पर है | 

इतनी ज़िम्मेदारी मिलना अच्छा भी लगता है और कभी कभी खीज भी होती है | खीज इसलिए क्यूंकि दुनिया भर के लोग बस यह मान कर बैठ जातेहैं की मैं हर वक्तयही काम कर रहा हूँ |अभी दो तीन दिन पहले का ही वाकया ले लीजिए |रात के तीन बजेमुझे उत्तर प्रदेश के सुदूर क्षेत्र बहराइच के रिपोर्टर नें अचानक फोन कर दिया | मैंने लगभग बेहोशी की हालत में फोन उठाया और उधर से आवाज़ आई सर प्रणाम, ताहिर बोल रहे हैं बहराइच से” | कुछ पलों के लिए तो मुझे लगा की शायद मैं कोई सपना देख रहा हूँ |अभी ठीक से इस सपने और हकीकत के बीच के हेरफेर को मैं समझा तक नहीं थाकि दोबारा आवाज़ आई सर सो तो नहीं रहे थे आप?”|खैर तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि हाँ यह वाकई हकीकत हैकि कोई मुझसे तीन बजे रात को फोन कर यह पूछ रहा है कि कहीं मैं सो तो नहीं रहा था | इंतहाई गुस्से की हालत में मैं सिर्फ बोलोके आगे और कुछ न कह पाया |तब ताहिर नें कहा सर दो गाडियां भीड़ गयी है हाईवे पर,दो मरे हैं,एक औरत भी है हास्पिटल में,पर पक्का मर जायेगी सर|इससे पहले मैं और कुछ कह पाता ताहिर नें फिर कहा सर तो मैं फुटेज भेजू“? बदकिस्मती यह कि बेहोशी से होश में आने के तुरंत बाद मिली ऐसी खबर के बारे में फैसला लेना भी ज़रूरी था |क्यूंकि ऐसी छोटी जगहों पर हर कहानी के हिसाब ऐसे टेम्परेरी रिपोर्टरों को पैसे दिये जाते हैं |आखिरकार मैंने सिर्फ यह खबर सिर्फ एक फ्लैश के तौर पर चलवाना बेहतर समझा क्यूंकि फुटेज के 'लायक' इसमें कुछ कमाल का नहीं था और ताहिर के मुताबिक़ मौके पर से भीड़ चुकी गाडियां भी हट चुकी थी |अब आप कुछ कुछ समझ पा रहे होंगे कि कैसे मुझ जैसे टी.वी पत्रकार चौबीस घंटे ड्यूटी पर ही होते हैं |

पर मुझे इस से कोई शिकायत नहीं |आखिर पत्रकारिता हमेशा से मेरा जूनून रहा है और जूनून के आगे तो सब कुछ बौना हो जाता है |अच्छा लगता है जब कोई भी खबर दुनिया में सबसे पहले मेरे ही पास आती है |पर यह बात सही है कि इस तरह के हट के पेशे से जुड़ने के जूनून नें आप लोगों कि तरह एक नियंत्रित जीवन न जी सकने पर मुझे मजबूर कर दिया है |उम्मीद है किसी रविवार की सुबह मैं भी आप लोगों कि तरह देर तक सोऊंगा और दिन और रात के फर्क को देख ही नहीं, महसूस भी कर पाउँगा |

Saturday, 16 June 2012

वो रूहानी आवाज़..

टी.वी पत्रकारिता में बिताए पिछले कुछ सालों नें मुझे बहुत हद तक मज़बूत बनाया है |मज़बूत इतना कि किसी हस्ती के इंतकाल कि खबर तक मेरे लिए महज़ एक खबर से ज्यादा कुछ नहीं रह गयी |अक्सर अचानक खबर आती है किसी बड़ी हस्ती के चले जाने कि तो मैं भी उसको एक खबर कि नज़र से देखते हुए उसे एक बेहतर कवरेज देने की कोशिश में जुट जाता हूँ |पर उस दिन बहुत अलग महसूस किया जब रूहानी आवाज़ में गाने वाले मशहूर ग़ज़ल गायक मेहेदी हसन साहब के इन्तकाल की खबर मुझे मिली |बदकिस्मती ऐसी कि मैं खुद उस दिन शिफ्ट में था और एक खबर कि तरह उसे देखने पर मजबूर था | कुछ पलों के लिए डबडबा आयीं मेरी आँखों को दोबारा पोछ कर उस इंसान के मरने कि खबर बनाने के लिए मजबूर जो मेरे ग़मों और यादों का हमेशा साथी रहा |

यह बात और है कि जब तक मैंने होश संभाला तब तक मेहँदी हसन साहब नें गाना छोड़ दिया था |लेकिन विरासत में मिली गायन कला की तरफ मेरे रुझान और खुद संगीत के एक छात्र के रूप में मैंने मेहँदी हसन साहब को बहुत करीब से जाना |मुझे अभी भी ठीक से याद है कि हसन साहब की सदाबहार गजलें मेरे कानों में तब से घुलने लगी थी जब मैं ठीक से बोलना भी नहीं जानता था |जो शुरू में सिर्फ कुछ बेहद यादगार धुनें थी मेरे लिए,वो धीरे धीरे दिल के ऐसे जज़्बात बनते गए जो हसन साहब की आवाज़ में पिरोये हुए दर्द के अफ़साने थे |हसन साहब की आवाज़ में जादू था,यह कहना तौहीन होगी उनकी |शायद आजतक उनकी आवाज़ के लिए सबसे सही शब्दों का चयन लता मंगेशकर जी ने किया है |उन्होनें कहा था की हसन साहब की आवाज़ के ज़रिये खुद अल्लाह हमसे बात करते हैं |इसमें कोई शक नहीं कि हसन साहब के नगमों में वो रूहानी ताकत थी जो आपको अल्लाह से जोड़ देने के लिए काफी थी|मुझे ठीक से याद तो नहीं लेकिन शायद उनकी गज़ल ‘रंजिशी सही’वो सबसे पहली गज़ल थी जो मेरे कानों में पड़ी थी |शायर एहमद फ़राज़ के लिखे अल्फाजों को इस खूबसूरती से मेहँदी हसन साहब नें गाया कि आजतक उसकी गूँज हमें उनकी आवाज़ से बाँध देती है | उनके नायाब नगमें ‘गुलों में रंग’ और ‘मोहब्बत करने वाले’ सुनने वालों पर कुछ ऐसा जादू कर देते कि उन्हें रूहानी आवाज़ की मालिक हसन साहब के हर सुर से प्यार हो जाता |

बाकी सभी के लिए मेहँदी हसन साहब भले ही सिर्फ एक ग़ज़ल गायक रहे हों लेकिन मेरे लिए तो वो मेरे गुरु भी थे |उन्हें सुन सुन कर मैंने गाने के बारे में बहुत कुछ सीखा |हालाँकि उनका तो एक अंश बराबर भी मैं मरते दम तक नहीं गा सकूंगा लेकिन फिर भी कोशिश ज़रूर रहेगी कि उनसे ही सीखता रहूँ जैसा की बचपन से सीखता आया हूँ |एक गायक होने के नाते मैंने एक खास बात देखी मेहँदी हसन साहब के बारे में |उनकी सबसे हैरान कर देने वाली खासियत थी उनके हर सुर का इस कदर सधा होना कि उसमें एक कण भर भी इधर से उधर नहीं होता था चाहें वो किसी भी ताल या राग में गायें |अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि बड़े से बड़े गायक भी रिकॉर्डिंग में जितना अच्छा गाते हैं उतना अच्छा लाईव नहीं गा पाते |मैंने आजतक सिर्फ और सिर्फ मेहेदी हसन साहब इकलौते ऐसे गायक देखे जो लाईव हो या रिकॉर्डिंग, हर हाल मे सुरों में शुद्धता बनाये रख पाते थे |उनकी दूसरी बहुत खास बात थी कि अपनी हर गज़ल को गाने के लिए जो भी राग वो चुनते थे वोह बहुत सटीक होता था |मसलन उनकी ग़ज़ल ‘खुली जो आँख’ जो कि उन्होनें राग भंकार में गाई |इस राग की खासियत है कि यह उस समय गाया जाता है जब भोर हो रही होती है लेकिन अँधेरा भी बना होता है | उस राग में जब मेहेदी हसन साहब नें इस ग़ज़ल के बोल “खुली जो आँख, वोह था, न वो ज़माना था, दहकती आग थी तन्हाई थी, फसाना था” को गाया तो इन अल्फाजों को मैंने सिर्फ सुना ही नहीं, महसूस भी किया | बहुत कम लोगों को यह पता होगा की मेहँदी हसन साहब बेहद धीमे गाते थे,मसलन उनके साथ संगत करने वाले तबला वादक तक को कान लगाकर उन्हें सुनना पड़ता था नहीं तो ताल बनाये रखना आसान नहीं था |पर इस धीमी आवाज़ में और चेहरे पर एक अजीब सा सुकून लिए हसन साहब बड़ी से बड़ी हरकत भी आसानी के साथ कर जाते थे और पता तक नहीं चलता था |

आज मेहँदी हसन साहब भले ही हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनके नगमें के रूप में हमें एक ऐसा साथी दे गए हैं जो उम्र के हर पड़ाव पर हमारा साथ देता है |मुझ जैसे और न जाने कितने करोडो लोगों के दिल में आज मेहँदी हसन साहब के चले जाने से वो मायूसी है जो शायद कभी किसी अपने के जाने से भी नहीं हुई हो |उनके जाने से मैंने सिर्फ एक गुरु ही नहीं, बल्कि अपने परिवार का हिस्सा भी खोया है | जिस तरह अल्लाह को हम देख नहीं सकते और सिर्फ महसूस कर सकते हैं अपने आस पास, उसी तरह मेहँदी हसन साहब और उनके यादगार लम्हों को भी हम महसूस कर सकते हैं और करते रहेंगे आने वाले कई सौ सालों तक क्यूंकि खुद अल्लाह तो ज़मीन पर कई सौ सालों में एक ही बार आते हैं |

जद्दोजेहद

स्वर्ग और नर्क के बारे में कई कहानियां हम सभी नें सुनी और पढ़ी हैं |कहा जाता है कि व्यक्ति अच्छे काम करके स्वर्ग और बुरे काम करके नर्क जाता है |पर मैंने कभी कहीं किसी ऐसी जगह के बारे में न पढ़ा और न सुना जहाँ स्वर्ग और नर्क से पहले बस इंसान कतारों में खड़े दिखते हैं मौत के इंतज़ार में | सबकी आँखों में मौत को लेकर एक जाना पहचाना सा खौफ साफ़ दिखता हैं |एक तरह से स्वर्ग और नर्क से पहले का पड़ाव |कुछ ऐसा ही महसूस हुआ आज जब मैं अपनी माँ को एक डॉक्टर को दिखाने के लिए आल इण्डिया इंस्टीटयूट ऑफ मेडिकल साईंसेस यानी एम्स पहुंचा |एक लंबे अरसे से दमे से परेशान अपनी माँ को एम्स ले जाना अपने आप में एक चुनौती साबित होगी इसका इल्म तो था मुझे लेकिन कुछ ऐसे ह्रदय विदारक दृश्य भी दिखेंगे जो ज़हन पर बेहद गहरी छाप भी छोड़ जायेंगे इसके बारे में सोचा तक नहीं था |                 

सुबह के दस बजे हमारी गाडी एम्स के अंदर दाखिल हुई |ऐसा लगा मानों चांदनीचौक की गलियों में गाडी मोड दी हो |एम्स के अंदर की अच्छी भली चौड़ी सड़क भी कुछ निरंतर चलते काम और लोगों की भीड़ से इस कदर सिकुड चुकी थी जैसे पुरानी दिल्ली की वो गलियाँ जहाँ इंसान अपने को ही खो देते हैं |गाडी से पैर बाहर रखते ही ऐसा लगा मानों हम सब किसी मेले का हिस्सा बन गए हों |जहाँ तक नज़र जा रही थी बस लोग ही लोग |हजारो की तादाद में लोग बस चले ही जा रहे थे | कुछ घसीटे जा रहे थे, कुछ लिथड रहे थे, कुछ बस शून्य में खड़े कुछ ताक रहे थे, कुछ में चलने की शक्ति बची ही नहीं थी इसलिए सड़क किनारे ही बैठ गए थे और कुछ निढाल होकर किसी गंदे कपडे को बिछाकर वहीं लेट गए थे |एम्स के इस पहले दृश्य को देखकर मेरा दिल भी एक मिनट के लिए काँप गया |शुक्र है कि कुछ ही दूर इस जुलूस का हिस्सा बनकर चलने पर हम अपनी मंजिल तक पहुँच गए और वो मंज़िल थी रेस्पीरेट्री विभाग या सांस की बीमारियों से जुड़ा विभाग |विभाग के विशाल हाल को दूर से ही देख जून की चिलचिलाती पिघला देने वाली धूप से निजाद पाने के ख्याल से ही कुछ आराम मिलने लगा |लेकिन यह खुशी कुछ पलों में ही दिल दहला देने वाले दृश्य नें गायब कर दी |कम से कम पचास फीट लंबे और पच्चीस फीट चौड़े इस विशाल हाल में घुसते ही गर्मी और उमस से भरे हवा के एक भभके नें हमारा स्वागत किया और हमें भी इसका हिस्सा बना लिया |अंदर करीब छ: सौ इंसानों का एक हुजूम था जो किसी टिड्डी दल के अचानक हुए हमले से ज़रा कम नहीं लग रहा था |हॉल की ऊंचाई करीब बीस फुट तो रही ही होगी लेकिन मुझे तो बमुश्किल चौदह फीट का ऊपरी हिस्सा ही नज़र आ रहा था | नीचे का छ: फीट तो इंसानी दीवार से ढँक गया था |हॉल में एक कतार में कमरे बने हुए थे जिसमें अलग अलग डॉक्टर बैठे हुए थे |इन आठ कमरों में से चार में ही डॉक्टर मौजूद थे और बाकि चार में तो बस कुछ किताबें और मरीजों के रिकॉर्ड ऊंघ रहे थे पर बाहर खड़े सैकड़ों लोगों से ज्यादा भाग्यशाली थे |जहाँ एक तरफ पूरे हॉल में लगे कई विशालकाय एयर कंडीश्नो की हवा इस गर्मी में केवल एक उम्मीद से ज्यादा और कुछ नहीं दे रही थी,वहीं इन खाली कमरों में चल रहे एयर कंडीश्न कम से कम किताबो और मेडिकल रेकॉर्ड को तो बेहद आराम पहुंचा रहे थे |हर कमरे के बाहर इंसानों का इतना बड़ा हुजूम था कि लग रहा था कि अगर कुछ और देर हालात ऐसे ही रहे तो दीवारें जवाब ही दे जाएँगी |कहने को एक कतार में लोग ज़रूर लगे थे हर कमरे के बाहर, लेकिन वो कतारें कब इस इंसानी सैलाब में गुम हो जाती थी इसका इल्म तो कतार में खड़े होने वालों तक को नहीं था |                 

जब तक हम भी इस सैलाब का हिस्सा बनकर डॉक्टर तक पहुचने की कोशिश में लगे थे, तब तक आस पास देखते रहने के अलावा कोई चारा भी नहीं था |मुझसे कुछ दूर ही एक माँ अपने सोते हुए छोटे से बच्चे पर हर कुछ मिनट में हमला कर रही दो मक्खियों से जंग लड़ने में लगी थी |यह कहना मुश्किल था कि उसका बच्चा बीमार है या वो खुद, या किसी और के ही साथ आई है |एक अनमना सा आदमी एक बेहद बुजुर्ग शख्स जो कि उसके पिता ही लग रहे थे उनको बीच बीच में तमाम कागजात को सँभालते हुए एक बोतल में भरा ग्लुकोस पिला रहा था |एक छोटा बच्चा जो शायद खो गया था, बस बेतहाशा रोते हुए भीड़ के बीच से अपना रास्ता बनाता हुआ किसी अनजान मंजिल को ओर बढ़ा जा रहा था | करीब करीब हर शख्स इस पूरे हॉल में बीमार लग रहा था |यह कहना मुश्किल था कि वो पहले से ही बीमार था और किसी के साथ आया है या किसी बीमार को लाया था और अब खुद बीमार हो गया है |पास ही खड़ी एक वृद्ध महिला नें तो एक ग्लूकोस की बोतल अपने ही हाथों में पकड़ रखी थी जिसका दूसरा सिरा उसकी नसों में घुसा हुआ था |एक व्यक्ति जिसके शरीर का कुछ हिस्सा किसी हादसे में जल चुका था,केवल अपनी बनियान में अपनी उतारी हुई शर्ट से हवा कर रहा था |हालाँकि इस हाल में काफी कुर्सियां भी थी लेकिन वो सिर्फ कुछ बेहद भाग्यशाली लोगों को ही नसीब हो पाई थी | हॉल में तकरीबन हर आँख इन्हीं कुर्सियों को ऐसी ललचाई नज़रों से देख रही थी जैसे मानों खुली सोने की खदान हों | मेरी बहन नें भी एक नौजवान से मेरी मां के लिए एक कुर्सी खाली करने को कहा तो उसने ऐसे घूर के देखा मानों हमने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो |ज़ाहिर सी बात है कि उसनें केवल घूर कर और अपने पैरों में हो रहे दर्द का हवाला देकर ही हमें टरका दिया |लेकिन हमसे विपरीत कुछ ऐसे लोग भी थे जो अपना दावा लगातार उन कुर्सियों पर ठोक रहे थे |पास ही दो औरतें इसलिए लड़ रही थी क्यूंकि उनमें से एक नें कुर्सी से उठकर डॉक्टर के कमरे में झाँकने की कोशिश में ही अपनी कुर्सी गँवा दी थी |हर नया इंसान जो इस हॉल में दाखिल होता उसको ऐसे घूरा जाता जैसे बढ़ती गर्मी को बढाने का सारा पाप उसी के सिर है |अभी मैं इन सब दृश्यों को अपने अंदर समेट ही पाया था कि इतने में “हटिये, ज़रा रास्ता दीजिए” की आवाज़ के साथ ही एक ज़ोरदार झटके से मैं एक तरफ गिरते गिरते बचा | एक नौजवान सरदार अपने बेहद बूढ़े पिता को स्ट्रेचर पर हॉल में लाया था |उस एक स्ट्रेचर के आने से लोगों के हाव भाव कुछ और कठोर हो गए थे क्यूंकि उस स्ट्रेचर नें चार आदमियों की जगह ले ली थी | उस वृद्ध की तो खैर किसी को परवाह थी नहीं |ऐसी ही दो चार स्ट्रेचर और भी थी जिसपर इंसान से दिखने वाली कोई चीज़ बस पड़ी हुई थी |फिर एक नौजवान नें अपना फ़र्ज़ समझते हुए इन सब स्ट्रेचरों को एक कतार में लगाने का हुक्म दिया जिससे कुछ रास्ता बन सके |उसके बाद से हर आती स्ट्रेचर के लिए वही जगह निर्धारित हो गयी और जल्द ही उस नौजवान की हॉल ही बनाई स्ट्रेचर पार्किंग में जगह खत्म हो जाने से कुछ तू तू मैं मैं शुरू हो गयी |समय बिताने के लिए लोग अपनी बीमारी को दूसरे से बड़ा बता कर अपने भाग्य को कोस रहे थे |कुछ गर्म खून के नौजवान बस सरकार और प्रशासन पर अपनी नाराज़गी उतर रहे थे और बाकि किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच चुके थे और बस शून्य में स्थिरता से ताक रहे थे | 

               हर कमरे के बाहर एक दुबला पतला दरबान खड़ा था जो हर थोड़ी देर में लोगों को कमरे से दूर खदेड़ने का असफल प्रयास कर रहा था |पर फिर कुछ देर में भीड़ का रोष उसपर हावी हो जाता था और वो एक कोने में सिमट जाता |और फिर से हिम्मत जुटा कर नए सिरे से शुरुआत करता | यदा कदा कमरे का दरवाज़ा किसी प्रभावशाली आदमी के लिए यकायक खुल जाता और वो सभी के बीच से यूं होकर निकल जाता जैसे वहाँ कोई हो ही नहीं | इसी एक अवसर पर मुझे अंदर की एक झलक भी दिखी | एक डॉक्टर अपने आले से एक मरीज़ को देख रही थी | कमरे इतना बड़ा की उसमें कम से कम तीस आदमी आराम से खड़े हो जायें, पर शायद बाहर खड़ी भीड़ का दुर्भाग्य था या अंदर बैठी डॉक्टर साहिबा का सौभाग्य की पूरे कमरे में बस एक वही काबिज थी |बीच बीच में कुछ जूनियर डॉक्टर भी अंदर या बाहर जाते दिख जाते | सफ़ेद कोट पहने ये डॉक्टर भीड़ में से क्या निकलते, ऐसा लगता मानों कि देवता धरती पर उतर आये हों |ऐसे में जब डॉक्टर के कमरे में झाँक तक पाना अपने आप में एक उपलब्धि से कम नहीं लग रहा था,यह सवाल कि डॉक्टर से मिला कैसे जायेगा हम सबके दिमाग में चल रहा था | शुक्र है मेरी बहन के एक पुराने पत्रकार मित्र वहाँ अपने किसी काम के चलते आ गए और हमें साथ लेकर वो बेहद आसानी से कमरे के अंदर पहुँच गए | मुझे तो वो उस वक्त किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लग रहे थे और कमरे में घुस पाने की खुशी का तो वर्णन ही शब्दों में कर पाना मुश्किल था |हालाँकि इस खुशी के साथ मैं बहुत शर्मिंदगी भी महसूस कर रहा था क्यूंकि कमरे के बाहर रिश्तेदारों और मरीजों द्वारा लड़ी जा रही जंग का हिस्सा बने बगैर ही मैंने डॉक्टर से अपनी माँ को दिखवा पाने की जीत हासिल कर ली थी |बाहर निकलने पर ऐसा लगा की कई सौ जोड़ी आँखें हमें खा जाने के लिए उतावली हो रही है |माहौल कुछ इस कदर नाज़ुक हो चुका था कि मुझे लगा कि मैं किसी दंगे के बीचों बीच फँस गया हूँ |मारे डर से सहमे मैंने बचपन में सीखे जुडो कराटे के कुछ वार भी मन में दोहरा डाले |शायद ऊपर वाला उस दिन वाकई मेहरबान था क्यूंकि इन घूरती आँखों के अलावा और किसी नें एक शब्द नहीं कहा और सब लोग अपनी लड़ाई लड़ने में दोबारा मशगुल हो गए |विभाग से बाहर निकलकर चैन की सांस ली और जून की चिलचिलाती धूप पहली बार नैनीताल के खुशनुमा मौसम की तरह महसूस हुई |             

गाडी तक पहुचने के रास्ते में हम एक आध और विभागों के सामने से निकले जिसमें हालात और भी ज्यादा बदतर थे | बर्न्स विभाग नें तो मुझे नर्क की जीती जागती तस्वीर ही दिखा दी जहाँ लोगों को देख तक पाने में मैंने खुद को असमर्थ पाया |अपनी गाडी की ठंडक में आराम पाते ही हम सब को राहत की अनुभूति हुई |पर पिछले कुछ घंटों में अपने सामने दिखे इन सभी दृश्यों को मैं भूल नहीं पा रहा था | अगर एक अस्पताल में भी अपनी जिंदगी बचाने के लिए लोगों को एक किस्म की जंग लड़नी पड़ रही है तो जीवन जीने के लिए क्या करना पड़ता होगा यह मैं सोचकर हैरान था |पर मैंने भी उन हजारो लाखों पढ़े लिखे नौजवानों की तरह इस समस्या को अधर में छोडकर पास रखी एक मैग्जीन को उठाया और पढ़ना शुरू कर दिया |शायद भाग्यशाली की यही नयी परिभाषा है जिसमें आप किसी के भी सिर पर पैर रखकर कहीं भी पहुँच सकते हैं | बाकि बेचारों का क्या है, वो तो किस्मत को कोसते कोसते जी ही लेंगे |

मेरे दोस्त

रात गहरी हो चली है | आस पास सिर्फ हवा में फैले सन्नाटे के अलावा कुछ और सुनाई नहीं देता | अमूमन लोग रात को सोते हैं,मगर मैं जागने का शौक रखता हूँ |किसी भी समझदार इंसान की नज़र में यह पागलपन ही है |हो भी क्यों नहीं, अगर सारी दुनिया रात को सो रही है तो मुझे जागने का हक कैसे हो सकता है |और यह सिर्फ रात को जागने तक सीमित नहीं है, हर वो चीज़ जो हम भीड़ से अलग हट कर करना चाहते हैं हमें न जाने क्यों कटघरे में खड़ा कर देती है | पहले ऐसा करता था तो ज़रूर अपने आप से पूछता था कि क्या मैं वाकई पागल हूँ, मानसिक रोगी हूँ या फिर बस यह एक जिद है अलग लगने की |मगर जैसे जैसे वक्त बीता,मैं बड़ा हुआ तो समझ में आने लगा कि मैं औरों से शायद अलग ही हूं |अलग इसलिए क्यूंकि मेरे लिए जिंदगी के मायने मेरे अपने बनाये हुए रहे हैं,न कि वो जो माँ बाप नें सिखाए या फिर किताबों में पढ़े | पर यह बिलकुल ज़रूरी नहीं कि जिंदगी की तरफ मेरा रवैय्या सही ही हो | लेकिन हर इंसान की तरह मैं भी अपनी सोच को सर्वोपरि मानते हुए बस वही करता आया हूँ जो मुझे ठीक लगा है |मसलन रात का जागना ही ले लीजिए, लेकिन इसके पीछे एक वजह है |रातों से बेहद पुराना नाता रहा है मेरा | जब से एक अलग कमरा मिला और आँखें जबरन न बंद कर लेने की आज़ादी,शायद तब पहली बार रात से सामना हुआ |याद नहीं कब पहली बार मुलाकात हुई थी रात से, लेकिन बहुत धुंधला धुंधला याद है कि मुलाकात थी बड़ी यादगार| पहली बार में ही अच्छे दोस्त बन गए थे हम दोनों |शायद इसलिए क्यूंकि रात नें मुझे वो देने का वादा किया जो कि इंसानों नें देने से साफ़ इनकार कर दिया | और वो था सुकून | एक तरफ सैंकडों इंसानों की इस दुनिया में कोई एक आद भी शायद ही मिले जो आपको सुकून पहुंचाए | हाँ, वादा देने वाले तो बहुत मिल जायेंगे, लेकिन कोई सच में सुकून दे पाए तो जानें |और अगर कोई भूल से मिल भी जाये जो सुकून दे,तो तुरंत बदले में कोई न कोई शर्त ज़रूर लगा देता है |और बस तभी सारा सुकून उस एक शर्त की क़ुरबानी चढ जाता है | पर रात ऐसा कुछ नहीं मांगती | यह बस देती है, दिल खोलकर सुकून देती है | रात से बहुत कुछ सीखने को भी मिला है मुझे | रात से सब्र करना सीखा है मैंने | शांत रहना सीखा है | सब कुछ अपने अंदर समेट लेने की काबलियत देखी है मैंने |ऐसा लगता है मानों ऊपर वाला रात के रूप में हमारी जिंदगी की स्लेट को रोज एक बार साफ़ कर देता है ताकि अगले दिन सूरज की पहली किरण के साथ हम उस स्लेट पर बीते हुए कल से भी कुछ बेहतर लिखने की शुरुआत कर सकें |मैंने भी खूब निभाई है दोस्ती इसके साथ जाग-जागकर |लेकिन पिछले कुछ समय से दोस्ती इतनी अच्छी नहीं रही |कोशिश तो मैंने बहुत की है हम दोनों के रिश्ते की मजबूत बनाये रखने के लिए, लेकिन जब इंसानी रिश्ते ही ठीक ढंग से नहीं निभा पाया तो यह तो सिर्फ रात ही है |

लेकिन हर कमज़ोर इंसान की तरह जिसे हर वक्त जीने के लिए कोई न कोई सहारा चाहिए ही होता है, मैंने भी कुछ नए दोस्त ढूंढें, रात से अपनी दोस्त कम होने के साथ |या यूं कहिये कि रातों से अब वैसी दोस्ती नहीं जैसी पहले थी क्यूंकि अब उसकी जगह किसी और जिगरी दोस्त नें जो ले ली है |हाल ही बने इस नए दोस्त का नाम है दर्द |ऐसा नहीं कि अकस्मात ही आ गया हो जिंदगी में यह |अगर अचानक आया होता तो शायद इतना अच्छा दोस्त तो कभी न बन पाता |यह तो बहुत पहले से ही जिंदगी का हिस्सा रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से जब से इसको बेहतर जाना है तब से इसकी आदत पड़ गयी है |अब इस दर्द के बिना जिंदगी के बारे में सोचना भी बेमानी सा लगता है |ऐसी गहरी दोस्ती तो रातों के साथ भी नहीं थी जैसी कि दर्द के साथ हो गयी है |अजीब सी ताकत है इस कमबख्त में |चाहें जितना दूर जाने की कोशिश करो इससे,यह साथ नहीं छोड़ता |कभी धडकनों का हिस्सा बन जाता है तो कभी साँसों में ही घुल जाता है |और मेरी किस्मत देखिये,जब कभी इससे कुछ हद तक निजाद पाने की कोशिश करता भी हूँ तभी किसी न किसी का दिया दर्द मेरे दामन में आ गिरता है |शुरू में बेहद तकलीफ होती थी,लेकिन फिर इससे दोस्ती कर ली |सोचा कि जब इसके साथ ही जीना है तो इससे भाग कर क्या फायेदा | बस वो दिन है और आजका दिन है, दोनों पक्के दोस्त बन चुके हैं |पर यह दर्द बहुत मांगता है |यह रात की तरह नहीं जो बस देता जाए और बदले में कुछ न मांगे |यह सिर्फ दिल के एक हिस्से तक ही सीमित नहीं रहना चाहता | यह फैलता जाता है, फैल रहा है, मेरी नसों के ज़रिये, मेरे खून के एक एक कतरे में,  मेरे दिमाग में, मेरी रगों में | भूलता जा रहा हूँ खुद को क्यूंकि इस दर्द नें सोचने समझने की ताकत पर भी शायद अब अपना घर बनाना शुरू कर दिया है |पता नहीं और क्या क्या मांगेगा यह दर्द |अब कभी मन भी करता है कि इससे दूर भाग कर अपनी पुरानी दोस्त रात के आगोश में ही समां जाऊं तो भी यह ऐसा होने नहीं देता |यह किसी और के साथ बांटने को मुझे तैयार ही नहीं |पर यह बात सही है कि शायद अब किसी और से दोस्ती न कर पाऊँ कभी |या यूं समझिए कि शायद यह दर्द इस काबिल छोड़े ही नहीं कि फिर कभी दोस्ती कर पाऊँ किसी और से |अब सिर्फ एक ही दोस्त बनाने की ताकत है मुझमें | अल्लाह से दोस्ती करना चाहता हूँ |एक बार उसके दामन में सिर झुका कर जी भर के रोना चाहता हूँ |सिर्फ एक वही है जो दर्द से निजाद दिला पाता है |पर अब अल्लाह नें भी मुंह मोड लिया है |जानता है न कि दर्द उसने तो दिया नहीं, मेरा खुद का लिया हुआ है, इसलिए मुझे अपने हाल पर छोड़ दिया है | अकेला, अपने इस नए दोस्त से दोस्ती निभाने को और रहम की उम्मीद में बस बेबस एक टक उसकी ओर ताकते रहने को |

रिश्ते

सरपट भागती जिंदगी |सुबह और रात में बाल बराबर का फर्क और हर वक्त सिर पर भीड़ से आगे निकल जाने कासवार जूनून |यह है इक्कीसवीं सदी |घड़ी के निरंतर चलते कांटे और कैलेण्डर पर बदलती तारीखें ही इस फर्क को ज्यादा बेहतर समझा सकती है |असल में वक्त की एहमियत जो शायद आज हो गयी है वो पहले नहीं हुआ करती थी |इसका यह कतई मतलब नहीं है कि पहले लोगों के पास बहुत वक्त होता था |वक्त तब भी महत्व रखता था लेकिन उसके लिए हर चीज़ को ताक पर रख देना शायद उस समय के लोगों को गवारा नहीं था लेकिन आजकल की पीढ़ी के लिए वक्त बड़ा कीमती है | शायद इसलिए क्यूंकि वक्त ही पैसा है | और पैसा है तो जीवन का हर सुख है | लेकिन इस पूरे दलाव का दुष्प्रभाव अगर किसी चीज़ पर सबसे ज्यादा पड़ा है तो वो हैं इंसानी रिश्ते |रिश्ते, जो हमारे साथ हमारे पैदा होने से पहले ही हमसे जुड़ने के लिए तैयार ही जाते हैं | एक नवजात शिशु की पहली किलकारी के साथ ही उसके तमाम रिश्ते तय हो चुके होते हैं और मज़े की बात यह कि वो खुद इस बात से अनभिग्य होता है और इसके बाद वो रिश्ते,जो पहले से परिभाषित नहीं होते,जिनको हम खुद अपने आप अपनी मर्ज़ी से बनाते हैं। पर हममें से कितने लोग हैं जो इक्कीसवीं सदी में भी इन रिश्तों की एहमियत को समझते हैं ?

इसको कुछ और बेहतर ढंग से समझने के लिए आईये चलते हैं आज से पचास साल पीछे |पचास का वो दशक जब भारत आज़ाद हो चुका था |एक बिलकुल नयी मानसिकता जन्म ले रही थी |एकाएक नौजवानों को देश की आजादी के लिए मर मिटने के अलावा और भी बहुत कुछ करने की लालसा जागने लगी थी | हालाँकि यह इच्छा उस वक्त औरतों के मुकाबले मर्दों की कहीं ज्यादा थी |पर इसे संस्कारों की सालों से चढ़ी कई परतें कहिये या लोगों की जीवन में स्थिरता लाने की कोशिश, इंसानीं रिश्तों का बहुत मूल्य था | ऐसा नहीं था कि तब लोगों में मन मुटाव नहीं होता था, पारिवारिक कलह नहीं होती थी | लेकिन तब रिश्ते बेहतर बनाकर साथ रहने पर लोग ज्यादा जोर देते थे | एक ही छत के नीचे कई लोग अलग अलग विचारधारा के होते हुए भी खुशी खुशी साथ रह लिया करते थे |पर जैसे जैसे वक्त बीता वैसे वैसे विचारधारा भी बदली |सत्तर और अस्सी के दशक नें एक नया ही समाज देखा |विदेशी रहन सहन का बढ़ता असर कहिये या लोगों की जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने की बढ़ती चाह, परिवारों में दरारें पड़ना आम बात हो गयी| अचानक कहीं से अंग्रेजी के दो शब्द जिन्हें हम ‘न्युक्लीयर फैमिली’ के नाम से जानते हैं, समाज में बहुत आम होने लगे | पर यह इसलिए इतना बुरा साबित नहीं हुआ क्यूंकि इस शब्द में तब भी ‘फैमिली’ या परिवार शब्द का समावेश था जिस वजह से इसने परिवार की महत्वता को खंडित नहीं होने दिया | लेकिन जैसे जैसे इक्कीसवीं सदी पास आई इंसानी रिश्तों ने एक नया ही ज्वारभाटा देखा | बढ़ती मंहगाई, विदेशी सभ्यता को अपनी सभ्यता मान चुका आज का समाज और एक दूसरे से बहुत जल्द ऊब जाने की बढ़ती आदत नें जन्म दिया,आज के युवा को जिसको हम एक ‘इंडीविजुअल’ और एक ‘प्रैक्टिकल’ इंसान के रूप में बेहतर जानते हैं | ‘इंडीविजुअल’ इसलिए क्यूंकि अपनी पहचान बनाने की चाह युवाओं में इतनी प्रबल होती चली गयी कि इसके लिए अपनाये तौर तरीकों में भी फर्क आना शुरू हो गया |‘प्रैक्टिकल’ इसलिए क्यूंकि रिश्तों में कभी कभी आती खटास को इस पीढ़ी नें रिश्तों के सड़ जाने का नाम देकर उनसे किनारा करना ही बेहतर माना |रिश्तों को एक बोझ समझ लादे लादे फिरने से बेहतर इन्होनें उन्हें त्याग कर अपनी ही तरह के नए ‘डिस्पोज़ेबल’ रिश्तों को ज्यादा तव्वजो दी |पर रिश्तों की इस नई परिभाषा का सबसे ज्यादा असर पड़ा तो पति पत्नी जैसे नाज़ुक रिश्तों पर |क्यूंकि येही एकलौता ऐसा रिश्ता है जिसको एक इंसान अपनी जिंदगी में खुद अपनी मर्जी से जोड़ता है इसलिए यह ‘डिस्पोज़ेबल’ रिश्ते की परिभाषा यहाँ सबसे ज्यादा सही बैठती है |ये ही वजह है कि आज शादी और तलाक, इन दोनों का अनुपात करीब करीब एक सामान हो गया है |तलाक जैसा शब्द जो आज से पचास साल पहले पाप माना जाता था आज के युवाओं की आम बोलचाल की भाषा का एक हिस्सा बन चुका है |पहले स्कूल कालेजों में फ़िल्मी रूप में हुए प्यार को शादी जैसे पवित्र बंधन में तब्दील कर देने की जल्दी और फिर उतनी ही तेज़ी से उससे ऊब कर आज़ाद होने की लालसा नें आज युवाओं में से शादी जैसे रिश्ते की एहमियत और पवित्रता को ही साफ़ कर दिया है | इसलिए आज का आज़ाद ख्यालों का ‘इंडीविजुअल’ और ‘प्रैक्टिकल’ युवा इंसानी रिश्तों की एक अपनी ही परिभाषा गढता चला जा रहा है |

पिछले सिर्फ पचास सालों में इंसान नें रिश्तों को त्यागते त्यागते आज सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचना शुरू कर दिया है | शायद हमें इसका ज़रा भी इल्म नहीं कि अब हम सब, ‘हम’ जैसे शब्द की बजाये केवल ‘मैं’ जैसे शब्दों में यकीन रखने लगे हैं | लेकिन यह सिलसिला आखिर कब तक चल सकता है ? क्या इसके आगे भी कुछ और हो सकता है ? अब तो केवल हम खुद को ही भूल सकते हैं | तो क्या इंसान और जानवर के बीच का फर्क धुंधला होता जायेगा ? यानि जहाँ से मानवता शुरू हुई थी वहीं पर वापस पहुँच जायेगी ? क्या हम अपने पतन की और अग्रसर हैं ? शायद ही हममें से किसी को घडी की टिक टिक और कैलेंडर पर बदलती निरंतर तारीखों के बीच एक शून्य दिखाई दे रहा है जिसकी ओर हम तेज़ी से बढते जा रहे हैं | हम सब एक ऐसे नाज़ुक वक्त से निकल रहे हैं जहां बस एक सिरा ही बच गया है हमारे पास और अगर अभी ही उस सिरे को पकड़ कर वापस अपनी और खींचा गया तो वो दिन दूर नहीं जब हम वापस पचास साल पीछे नहीं बल्कि कई हज़ार साल पीछे पहुँच जायेंगे, जहाँ से हमने आपको इंसान कहना शुरू किया था |

इन्तज़ार

आज वक्त काट रहा हूँ कुछ खास होने के इन्तज़ार में | मज़े की बात तो यह, कि मालूम भी नहीं कि आखिर किस चीज़ के लिए वक्त काट रहा हूँ |पर ऐसा अक्सर होता है जब मैं इसी तरह वक्त को काटता रहता हूँ,कुछ खास होने के इन्तज़ार में | न मालूम मेरे जैसे कितने हैं, जो कि बस इन्तज़ार में वक्त काटते जा रहे हैं कुछ खास होने के |पर उनमें से असल में हैं कितने, जिनको वो कुछ खास मिल भी पाता है, यह कोई नहीं बता सकता |हम सब कुछ खास होने के इन्तज़ार में शायद अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा बिता देते हैं और धीरे धीरे हमारी उम्मीद इस कदर बढ़ जाती है की जब आखिरकार वो खास मौका या मौके आते भी हैं तो हम उनको पहचान तक नहीं पाते, क्यूंकि हम तो किसी बहुत बड़े वाक्ये की उम्मीद में होते हैं | ऐसा भी नहीं कि ऐसे खास मौके बेहद कम आते हैं | यह खास मौके वक्त वक्त पर हमारे सामने आते रहते हैं |इनके रूप हर बार अलग ज़रूर हो सकते हैं लेकिन यह आते ज़रूर हैं |पैदाइश से लेकर बड़े होने तक हम लोग जिंदगी में कुछ इस कदर उलझ चुके होते हैं की खुशी और गम के बीच सिर्फ एक बाल बराबर की दूरी ही महसूस करने लगते हैं | इसलिए कब खुश और कब दुखी होते हैं यह हम खुद ही नहीं समझ पाते | एक अजीब सी खीज रहती है दिमाग में हर वक्त |खीज अपने दिमाग में खुशियों और ग़मों के बीच लगातार चलते द्वन्द्ध में किसी एक के जीत जाने के इन्तज़ार में |और इस खीज में हम बीत रहा वक्त भी गवां बैठते हैं |शायद हम भूल जाते हैं कि अभी अभी जो एक पल निकला उसमें कितनी खुशियाँ थी |लेकिन हम तो इतने उलझे होते हैं अपनी ही बुनी उलझनों में कि होश ही नहीं होता कि क्या कुछ खो दिया इस एक लम्हें में हमने |अट्ठाईस साल की जी हुई जिंदगी को बहुत लंबा तो नहीं कहूँगा लेकिन इतने सालों में इतना ज़रूर समझ में आने लगा है की ऊपर वाले नें हर एक पल में कुछ खुशियाँ और कुछ गम छिपा कर भेजे हैं |वो बिना रुके ऐसे लम्हें भेजता रहता है |पर यह फैसला करने का हक भी हमपर छोड़ देता है कि हमें उसमें से खुशियाँ चाहिए या गम |अल्लाह हमपर और उसकी दी हुई अक्ल पर बेहद भरोसा करता है | इसलिए उम्मीद करता है कि हम ग़मों के पुलिंदे में से खुशियों के रेशे खुद ही ढूंढ लेंगे | लेकिन हम इंसान हर बार, वक्त बेवक्त उसका सिर शर्म से नीचे झुकाते रहते हैं |बार बार ग़मों को गले से लगा कर खुदा के सामने ही हाथ फैला कर खड़े हो जाते हैं |एक बार खुद को खुदा की जगह रखकर तो देखिये | कितना बुरा लगता होगा उसे जब देखता होगा कि उसकी दी हुई अक्ल को इस कदर ज़ाया कर रहे हैं |हाँ यह बात सही है कि यह बात जितनी कहने में आसान लगती है उससे कहीं ज्यादा मुश्किल असल जिंदगी में अपनाने में होती है |पर यह मुश्किल सिर्फ इसीलिए होती है क्यूंकि हमें ग़मों के साथ जीने की आदत पड़ चुकी होती है या यूं कहिये मज़ा आने लगता है |खुशी आती भी है तो बस इसी डर से खुश नहीं हो पाते हम, क्यूंकि फिर से आने वाले ग़मों को झेलना होगा |
 खुश रहना एक कला के सामान है| एक ऐसी कला जिसमें निपुणता बेहद मुश्किल से ही मिलती है | लोग पूरी पूरी जिंदगी भी बिता देते हैं तब भी इसमें महारथ हासिल नहीं कर पाते |पर इसमें पारंगत न हो पाने का सारा दोष अपने आप को ही देना गलत होगा | असल में इसकी एक बहुत बड़ी वजह हमारे आस पास के लोग और यह समाज है जिसका हिस्सा हम चाहते या न चाहते हुए भी हैं बन जाते हैं |औरों को क्या, अपने आप से शुरुआत कर लें |अव्वल तो हर वक्त खुश रहने वाला इंसान आपको ढूंढें नहीं मिलेगा,मिल भी गया तो हमारी बिना उसे जाने हुए भी उसके बारे में एक खराब धारणा ज़रूर बन जायेगी |हमें येही लगेगा की शायद वोह इंसान जिन्दगी को संजीदगी से लेता ही नहीं |शायद वोह आवारा है, शायद वो अभी भी एक बच्चा है, कोई बड़ी बात नहीं की हम उसको बेशर्म भी मान लें |और यह सब इसलिए क्यूंकि वोह हर वक्त खुश रहता है |क्या यह वाकई इतनी बड़ी गलती है ?क्या ऊपर वाले की दी हुई ताकत का हम खुल कर इस्तेमाल भी नहीं कर सकते |क्या बिगाड़ा है हमने उन लोगों का जो बिना हमें ठीक से जाने हुए भी अपनी अदालत में हमें सजा सुना देते हैं ?ये बात सही है की अक्सर खुश रहने वाले इंसान खुशी को पाने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं | कुछ मैखाने में अपना घर बना लेते हैं, कुछ धुएं के बादल में खुद को छिपा लेते हैं, कुछ खुद को  दुनिया से ही काट लेते हैं, और कुछ दुनियादारी में इतना ज्यादा पड़ जाते हैं की औरों की जिंदगियां खराब करने में ही खुशी महसूस करने लगते हैं | लेकिन वोह यह नहीं जानते की ऊपर वाला सब देखता है |और जब वोह ऐसा करते हुए किसी को देखता है तो वोह उससे ग़मों और खुशियों में किसी एक को चुनने का फैसला लेने की ताकत ही छीन लेता है |खुशियाँ हमारे आस पास ही बिखरी हुई हैं,उनको ढूँढने के लिए सिर्फ एक पैनी नज़र चाहिए |और वोह नज़र हम सबके पास है,बस ज़रूरत है भीड़ से कुछ अलग सोच रखने की और मान लेने की, की इन्तेज़ार मिथ्या है और बीत रहा लम्हा एक हकीकत |