अक्सर शब्द कम पड़ने लगते हैं इसको समझा पाने के लिए, इसलिए कम से कम में ही अपनी कैफ़ियत को बयाँ करने की कोशिश कर रहा हूँ -
जो सुकून के चंद लम्हे लगते हैं
न जाने क्यों, डबडबाई आँखों के साथी बन जाते हैं
सांसें भले ही न रुकें मगर
दिल के कुछ और घाव, ताज़ा ज़रूर हो जाते हैं
1 comment:
kis duniya me khoye rehte ho tum,
hamesha lagte thode se gum sum,
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