Saturday, 16 June 2012

जद्दोजेहद

स्वर्ग और नर्क के बारे में कई कहानियां हम सभी नें सुनी और पढ़ी हैं |कहा जाता है कि व्यक्ति अच्छे काम करके स्वर्ग और बुरे काम करके नर्क जाता है |पर मैंने कभी कहीं किसी ऐसी जगह के बारे में न पढ़ा और न सुना जहाँ स्वर्ग और नर्क से पहले बस इंसान कतारों में खड़े दिखते हैं मौत के इंतज़ार में | सबकी आँखों में मौत को लेकर एक जाना पहचाना सा खौफ साफ़ दिखता हैं |एक तरह से स्वर्ग और नर्क से पहले का पड़ाव |कुछ ऐसा ही महसूस हुआ आज जब मैं अपनी माँ को एक डॉक्टर को दिखाने के लिए आल इण्डिया इंस्टीटयूट ऑफ मेडिकल साईंसेस यानी एम्स पहुंचा |एक लंबे अरसे से दमे से परेशान अपनी माँ को एम्स ले जाना अपने आप में एक चुनौती साबित होगी इसका इल्म तो था मुझे लेकिन कुछ ऐसे ह्रदय विदारक दृश्य भी दिखेंगे जो ज़हन पर बेहद गहरी छाप भी छोड़ जायेंगे इसके बारे में सोचा तक नहीं था |                 

सुबह के दस बजे हमारी गाडी एम्स के अंदर दाखिल हुई |ऐसा लगा मानों चांदनीचौक की गलियों में गाडी मोड दी हो |एम्स के अंदर की अच्छी भली चौड़ी सड़क भी कुछ निरंतर चलते काम और लोगों की भीड़ से इस कदर सिकुड चुकी थी जैसे पुरानी दिल्ली की वो गलियाँ जहाँ इंसान अपने को ही खो देते हैं |गाडी से पैर बाहर रखते ही ऐसा लगा मानों हम सब किसी मेले का हिस्सा बन गए हों |जहाँ तक नज़र जा रही थी बस लोग ही लोग |हजारो की तादाद में लोग बस चले ही जा रहे थे | कुछ घसीटे जा रहे थे, कुछ लिथड रहे थे, कुछ बस शून्य में खड़े कुछ ताक रहे थे, कुछ में चलने की शक्ति बची ही नहीं थी इसलिए सड़क किनारे ही बैठ गए थे और कुछ निढाल होकर किसी गंदे कपडे को बिछाकर वहीं लेट गए थे |एम्स के इस पहले दृश्य को देखकर मेरा दिल भी एक मिनट के लिए काँप गया |शुक्र है कि कुछ ही दूर इस जुलूस का हिस्सा बनकर चलने पर हम अपनी मंजिल तक पहुँच गए और वो मंज़िल थी रेस्पीरेट्री विभाग या सांस की बीमारियों से जुड़ा विभाग |विभाग के विशाल हाल को दूर से ही देख जून की चिलचिलाती पिघला देने वाली धूप से निजाद पाने के ख्याल से ही कुछ आराम मिलने लगा |लेकिन यह खुशी कुछ पलों में ही दिल दहला देने वाले दृश्य नें गायब कर दी |कम से कम पचास फीट लंबे और पच्चीस फीट चौड़े इस विशाल हाल में घुसते ही गर्मी और उमस से भरे हवा के एक भभके नें हमारा स्वागत किया और हमें भी इसका हिस्सा बना लिया |अंदर करीब छ: सौ इंसानों का एक हुजूम था जो किसी टिड्डी दल के अचानक हुए हमले से ज़रा कम नहीं लग रहा था |हॉल की ऊंचाई करीब बीस फुट तो रही ही होगी लेकिन मुझे तो बमुश्किल चौदह फीट का ऊपरी हिस्सा ही नज़र आ रहा था | नीचे का छ: फीट तो इंसानी दीवार से ढँक गया था |हॉल में एक कतार में कमरे बने हुए थे जिसमें अलग अलग डॉक्टर बैठे हुए थे |इन आठ कमरों में से चार में ही डॉक्टर मौजूद थे और बाकि चार में तो बस कुछ किताबें और मरीजों के रिकॉर्ड ऊंघ रहे थे पर बाहर खड़े सैकड़ों लोगों से ज्यादा भाग्यशाली थे |जहाँ एक तरफ पूरे हॉल में लगे कई विशालकाय एयर कंडीश्नो की हवा इस गर्मी में केवल एक उम्मीद से ज्यादा और कुछ नहीं दे रही थी,वहीं इन खाली कमरों में चल रहे एयर कंडीश्न कम से कम किताबो और मेडिकल रेकॉर्ड को तो बेहद आराम पहुंचा रहे थे |हर कमरे के बाहर इंसानों का इतना बड़ा हुजूम था कि लग रहा था कि अगर कुछ और देर हालात ऐसे ही रहे तो दीवारें जवाब ही दे जाएँगी |कहने को एक कतार में लोग ज़रूर लगे थे हर कमरे के बाहर, लेकिन वो कतारें कब इस इंसानी सैलाब में गुम हो जाती थी इसका इल्म तो कतार में खड़े होने वालों तक को नहीं था |                 

जब तक हम भी इस सैलाब का हिस्सा बनकर डॉक्टर तक पहुचने की कोशिश में लगे थे, तब तक आस पास देखते रहने के अलावा कोई चारा भी नहीं था |मुझसे कुछ दूर ही एक माँ अपने सोते हुए छोटे से बच्चे पर हर कुछ मिनट में हमला कर रही दो मक्खियों से जंग लड़ने में लगी थी |यह कहना मुश्किल था कि उसका बच्चा बीमार है या वो खुद, या किसी और के ही साथ आई है |एक अनमना सा आदमी एक बेहद बुजुर्ग शख्स जो कि उसके पिता ही लग रहे थे उनको बीच बीच में तमाम कागजात को सँभालते हुए एक बोतल में भरा ग्लुकोस पिला रहा था |एक छोटा बच्चा जो शायद खो गया था, बस बेतहाशा रोते हुए भीड़ के बीच से अपना रास्ता बनाता हुआ किसी अनजान मंजिल को ओर बढ़ा जा रहा था | करीब करीब हर शख्स इस पूरे हॉल में बीमार लग रहा था |यह कहना मुश्किल था कि वो पहले से ही बीमार था और किसी के साथ आया है या किसी बीमार को लाया था और अब खुद बीमार हो गया है |पास ही खड़ी एक वृद्ध महिला नें तो एक ग्लूकोस की बोतल अपने ही हाथों में पकड़ रखी थी जिसका दूसरा सिरा उसकी नसों में घुसा हुआ था |एक व्यक्ति जिसके शरीर का कुछ हिस्सा किसी हादसे में जल चुका था,केवल अपनी बनियान में अपनी उतारी हुई शर्ट से हवा कर रहा था |हालाँकि इस हाल में काफी कुर्सियां भी थी लेकिन वो सिर्फ कुछ बेहद भाग्यशाली लोगों को ही नसीब हो पाई थी | हॉल में तकरीबन हर आँख इन्हीं कुर्सियों को ऐसी ललचाई नज़रों से देख रही थी जैसे मानों खुली सोने की खदान हों | मेरी बहन नें भी एक नौजवान से मेरी मां के लिए एक कुर्सी खाली करने को कहा तो उसने ऐसे घूर के देखा मानों हमने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो |ज़ाहिर सी बात है कि उसनें केवल घूर कर और अपने पैरों में हो रहे दर्द का हवाला देकर ही हमें टरका दिया |लेकिन हमसे विपरीत कुछ ऐसे लोग भी थे जो अपना दावा लगातार उन कुर्सियों पर ठोक रहे थे |पास ही दो औरतें इसलिए लड़ रही थी क्यूंकि उनमें से एक नें कुर्सी से उठकर डॉक्टर के कमरे में झाँकने की कोशिश में ही अपनी कुर्सी गँवा दी थी |हर नया इंसान जो इस हॉल में दाखिल होता उसको ऐसे घूरा जाता जैसे बढ़ती गर्मी को बढाने का सारा पाप उसी के सिर है |अभी मैं इन सब दृश्यों को अपने अंदर समेट ही पाया था कि इतने में “हटिये, ज़रा रास्ता दीजिए” की आवाज़ के साथ ही एक ज़ोरदार झटके से मैं एक तरफ गिरते गिरते बचा | एक नौजवान सरदार अपने बेहद बूढ़े पिता को स्ट्रेचर पर हॉल में लाया था |उस एक स्ट्रेचर के आने से लोगों के हाव भाव कुछ और कठोर हो गए थे क्यूंकि उस स्ट्रेचर नें चार आदमियों की जगह ले ली थी | उस वृद्ध की तो खैर किसी को परवाह थी नहीं |ऐसी ही दो चार स्ट्रेचर और भी थी जिसपर इंसान से दिखने वाली कोई चीज़ बस पड़ी हुई थी |फिर एक नौजवान नें अपना फ़र्ज़ समझते हुए इन सब स्ट्रेचरों को एक कतार में लगाने का हुक्म दिया जिससे कुछ रास्ता बन सके |उसके बाद से हर आती स्ट्रेचर के लिए वही जगह निर्धारित हो गयी और जल्द ही उस नौजवान की हॉल ही बनाई स्ट्रेचर पार्किंग में जगह खत्म हो जाने से कुछ तू तू मैं मैं शुरू हो गयी |समय बिताने के लिए लोग अपनी बीमारी को दूसरे से बड़ा बता कर अपने भाग्य को कोस रहे थे |कुछ गर्म खून के नौजवान बस सरकार और प्रशासन पर अपनी नाराज़गी उतर रहे थे और बाकि किसी दूसरी ही दुनिया में पहुँच चुके थे और बस शून्य में स्थिरता से ताक रहे थे | 

               हर कमरे के बाहर एक दुबला पतला दरबान खड़ा था जो हर थोड़ी देर में लोगों को कमरे से दूर खदेड़ने का असफल प्रयास कर रहा था |पर फिर कुछ देर में भीड़ का रोष उसपर हावी हो जाता था और वो एक कोने में सिमट जाता |और फिर से हिम्मत जुटा कर नए सिरे से शुरुआत करता | यदा कदा कमरे का दरवाज़ा किसी प्रभावशाली आदमी के लिए यकायक खुल जाता और वो सभी के बीच से यूं होकर निकल जाता जैसे वहाँ कोई हो ही नहीं | इसी एक अवसर पर मुझे अंदर की एक झलक भी दिखी | एक डॉक्टर अपने आले से एक मरीज़ को देख रही थी | कमरे इतना बड़ा की उसमें कम से कम तीस आदमी आराम से खड़े हो जायें, पर शायद बाहर खड़ी भीड़ का दुर्भाग्य था या अंदर बैठी डॉक्टर साहिबा का सौभाग्य की पूरे कमरे में बस एक वही काबिज थी |बीच बीच में कुछ जूनियर डॉक्टर भी अंदर या बाहर जाते दिख जाते | सफ़ेद कोट पहने ये डॉक्टर भीड़ में से क्या निकलते, ऐसा लगता मानों कि देवता धरती पर उतर आये हों |ऐसे में जब डॉक्टर के कमरे में झाँक तक पाना अपने आप में एक उपलब्धि से कम नहीं लग रहा था,यह सवाल कि डॉक्टर से मिला कैसे जायेगा हम सबके दिमाग में चल रहा था | शुक्र है मेरी बहन के एक पुराने पत्रकार मित्र वहाँ अपने किसी काम के चलते आ गए और हमें साथ लेकर वो बेहद आसानी से कमरे के अंदर पहुँच गए | मुझे तो वो उस वक्त किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लग रहे थे और कमरे में घुस पाने की खुशी का तो वर्णन ही शब्दों में कर पाना मुश्किल था |हालाँकि इस खुशी के साथ मैं बहुत शर्मिंदगी भी महसूस कर रहा था क्यूंकि कमरे के बाहर रिश्तेदारों और मरीजों द्वारा लड़ी जा रही जंग का हिस्सा बने बगैर ही मैंने डॉक्टर से अपनी माँ को दिखवा पाने की जीत हासिल कर ली थी |बाहर निकलने पर ऐसा लगा की कई सौ जोड़ी आँखें हमें खा जाने के लिए उतावली हो रही है |माहौल कुछ इस कदर नाज़ुक हो चुका था कि मुझे लगा कि मैं किसी दंगे के बीचों बीच फँस गया हूँ |मारे डर से सहमे मैंने बचपन में सीखे जुडो कराटे के कुछ वार भी मन में दोहरा डाले |शायद ऊपर वाला उस दिन वाकई मेहरबान था क्यूंकि इन घूरती आँखों के अलावा और किसी नें एक शब्द नहीं कहा और सब लोग अपनी लड़ाई लड़ने में दोबारा मशगुल हो गए |विभाग से बाहर निकलकर चैन की सांस ली और जून की चिलचिलाती धूप पहली बार नैनीताल के खुशनुमा मौसम की तरह महसूस हुई |             

गाडी तक पहुचने के रास्ते में हम एक आध और विभागों के सामने से निकले जिसमें हालात और भी ज्यादा बदतर थे | बर्न्स विभाग नें तो मुझे नर्क की जीती जागती तस्वीर ही दिखा दी जहाँ लोगों को देख तक पाने में मैंने खुद को असमर्थ पाया |अपनी गाडी की ठंडक में आराम पाते ही हम सब को राहत की अनुभूति हुई |पर पिछले कुछ घंटों में अपने सामने दिखे इन सभी दृश्यों को मैं भूल नहीं पा रहा था | अगर एक अस्पताल में भी अपनी जिंदगी बचाने के लिए लोगों को एक किस्म की जंग लड़नी पड़ रही है तो जीवन जीने के लिए क्या करना पड़ता होगा यह मैं सोचकर हैरान था |पर मैंने भी उन हजारो लाखों पढ़े लिखे नौजवानों की तरह इस समस्या को अधर में छोडकर पास रखी एक मैग्जीन को उठाया और पढ़ना शुरू कर दिया |शायद भाग्यशाली की यही नयी परिभाषा है जिसमें आप किसी के भी सिर पर पैर रखकर कहीं भी पहुँच सकते हैं | बाकि बेचारों का क्या है, वो तो किस्मत को कोसते कोसते जी ही लेंगे |

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