सरपट भागती जिंदगी |सुबह और रात में बाल बराबर का फर्क और हर वक्त सिर पर भीड़ से आगे निकल जाने कासवार जूनून |यह है इक्कीसवीं सदी |घड़ी के निरंतर चलते कांटे और कैलेण्डर पर बदलती तारीखें ही इस फर्क को ज्यादा बेहतर समझा सकती है |असल में वक्त की एहमियत जो शायद आज हो गयी है वो पहले नहीं हुआ करती थी |इसका यह कतई मतलब नहीं है कि पहले लोगों के पास बहुत वक्त होता था |वक्त तब भी महत्व रखता था लेकिन उसके लिए हर चीज़ को ताक पर रख देना शायद उस समय के लोगों को गवारा नहीं था लेकिन आजकल की पीढ़ी के लिए वक्त बड़ा कीमती है | शायद इसलिए क्यूंकि वक्त ही पैसा है | और पैसा है तो जीवन का हर सुख है | लेकिन इस पूरे बदलाव का दुष्प्रभाव अगर किसी चीज़ पर सबसे ज्यादा पड़ा है तो वो हैं इंसानी रिश्ते |रिश्ते, जो हमारे साथ हमारे पैदा होने से पहले ही हमसे जुड़ने के लिए तैयार ही जाते हैं | एक नवजात शिशु की पहली किलकारी के साथ ही उसके तमाम रिश्ते तय हो चुके होते हैं और मज़े की बात यह कि वो खुद इस बात से अनभिग्य होता है और इसके बाद वो रिश्ते,जो पहले से परिभाषित नहीं होते,जिनको हम खुद अपने आप अपनी मर्ज़ी से बनाते हैं। पर हममें से कितने लोग हैं जो इक्कीसवीं सदी में भी इन रिश्तों की एहमियत को समझते हैं ?
इसको कुछ और बेहतर ढंग से समझने के लिए आईये चलते हैं आज से पचास साल पीछे |पचास का वो दशक जब भारत आज़ाद हो चुका था |एक बिलकुल नयी मानसिकता जन्म ले रही थी |एकाएक नौजवानों को देश की आजादी के लिए मर मिटने के अलावा और भी बहुत कुछ करने की लालसा जागने लगी थी | हालाँकि यह इच्छा उस वक्त औरतों के मुकाबले मर्दों की कहीं ज्यादा थी |पर इसे संस्कारों की सालों से चढ़ी कई परतें कहिये या लोगों की जीवन में स्थिरता लाने की कोशिश, इंसानीं रिश्तों का बहुत मूल्य था | ऐसा नहीं था कि तब लोगों में मन मुटाव नहीं होता था, पारिवारिक कलह नहीं होती थी | लेकिन तब रिश्ते बेहतर बनाकर साथ रहने पर लोग ज्यादा जोर देते थे | एक ही छत के नीचे कई लोग अलग अलग विचारधारा के होते हुए भी खुशी खुशी साथ रह लिया करते थे |पर जैसे जैसे वक्त बीता वैसे वैसे विचारधारा भी बदली |सत्तर और अस्सी के दशक नें एक नया ही समाज देखा |विदेशी रहन सहन का बढ़ता असर कहिये या लोगों की जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने की बढ़ती चाह, परिवारों में दरारें पड़ना आम बात हो गयी| अचानक कहीं से अंग्रेजी के दो शब्द जिन्हें हम ‘न्युक्लीयर फैमिली’ के नाम से जानते हैं, समाज में बहुत आम होने लगे | पर यह इसलिए इतना बुरा साबित नहीं हुआ क्यूंकि इस शब्द में तब भी ‘फैमिली’ या परिवार शब्द का समावेश था जिस वजह से इसने परिवार की महत्वता को खंडित नहीं होने दिया | लेकिन जैसे जैसे इक्कीसवीं सदी पास आई इंसानी रिश्तों ने एक नया ही ज्वारभाटा देखा | बढ़ती मंहगाई, विदेशी सभ्यता को अपनी सभ्यता मान चुका आज का समाज और एक दूसरे से बहुत जल्द ऊब जाने की बढ़ती आदत नें जन्म दिया,आज के युवा को जिसको हम एक ‘इंडीविजुअल’ और एक ‘प्रैक्टिकल’ इंसान के रूप में बेहतर जानते हैं | ‘इंडीविजुअल’ इसलिए क्यूंकि अपनी पहचान बनाने की चाह युवाओं में इतनी प्रबल होती चली गयी कि इसके लिए अपनाये तौर तरीकों में भी फर्क आना शुरू हो गया |‘प्रैक्टिकल’ इसलिए क्यूंकि रिश्तों में कभी कभी आती खटास को इस पीढ़ी नें रिश्तों के सड़ जाने का नाम देकर उनसे किनारा करना ही बेहतर माना |रिश्तों को एक बोझ समझ लादे लादे फिरने से बेहतर इन्होनें उन्हें त्याग कर अपनी ही तरह के नए ‘डिस्पोज़ेबल’ रिश्तों को ज्यादा तव्वजो दी |पर रिश्तों की इस नई परिभाषा का सबसे ज्यादा असर पड़ा तो पति पत्नी जैसे नाज़ुक रिश्तों पर |क्यूंकि येही एकलौता ऐसा रिश्ता है जिसको एक इंसान अपनी जिंदगी में खुद अपनी मर्जी से जोड़ता है इसलिए यह ‘डिस्पोज़ेबल’ रिश्ते की परिभाषा यहाँ सबसे ज्यादा सही बैठती है |ये ही वजह है कि आज शादी और तलाक, इन दोनों का अनुपात करीब करीब एक सामान हो गया है |तलाक जैसा शब्द जो आज से पचास साल पहले पाप माना जाता था आज के युवाओं की आम बोलचाल की भाषा का एक हिस्सा बन चुका है |पहले स्कूल कालेजों में फ़िल्मी रूप में हुए प्यार को शादी जैसे पवित्र बंधन में तब्दील कर देने की जल्दी और फिर उतनी ही तेज़ी से उससे ऊब कर आज़ाद होने की लालसा नें आज युवाओं में से शादी जैसे रिश्ते की एहमियत और पवित्रता को ही साफ़ कर दिया है | इसलिए आज का आज़ाद ख्यालों का ‘इंडीविजुअल’ और ‘प्रैक्टिकल’ युवा इंसानी रिश्तों की एक अपनी ही परिभाषा गढता चला जा रहा है |
पिछले सिर्फ पचास सालों में इंसान नें रिश्तों को त्यागते त्यागते आज सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचना शुरू कर दिया है | शायद हमें इसका ज़रा भी इल्म नहीं कि अब हम सब, ‘हम’ जैसे शब्द की बजाये केवल ‘मैं’ जैसे शब्दों में यकीन रखने लगे हैं | लेकिन यह सिलसिला आखिर कब तक चल सकता है ? क्या इसके आगे भी कुछ और हो सकता है ? अब तो केवल हम खुद को ही भूल सकते हैं | तो क्या इंसान और जानवर के बीच का फर्क धुंधला होता जायेगा ? यानि जहाँ से मानवता शुरू हुई थी वहीं पर वापस पहुँच जायेगी ? क्या हम अपने पतन की और अग्रसर हैं ? शायद ही हममें से किसी को घडी की टिक टिक और कैलेंडर पर बदलती निरंतर तारीखों के बीच एक शून्य दिखाई दे रहा है जिसकी ओर हम तेज़ी से बढते जा रहे हैं | हम सब एक ऐसे नाज़ुक वक्त से निकल रहे हैं जहां बस एक सिरा ही बच गया है हमारे पास और अगर अभी ही उस सिरे को पकड़ कर वापस अपनी और खींचा गया तो वो दिन दूर नहीं जब हम वापस पचास साल पीछे नहीं बल्कि कई हज़ार साल पीछे पहुँच जायेंगे, जहाँ से हमने आपको इंसान कहना शुरू किया था |
पिछले सिर्फ पचास सालों में इंसान नें रिश्तों को त्यागते त्यागते आज सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचना शुरू कर दिया है | शायद हमें इसका ज़रा भी इल्म नहीं कि अब हम सब, ‘हम’ जैसे शब्द की बजाये केवल ‘मैं’ जैसे शब्दों में यकीन रखने लगे हैं | लेकिन यह सिलसिला आखिर कब तक चल सकता है ? क्या इसके आगे भी कुछ और हो सकता है ? अब तो केवल हम खुद को ही भूल सकते हैं | तो क्या इंसान और जानवर के बीच का फर्क धुंधला होता जायेगा ? यानि जहाँ से मानवता शुरू हुई थी वहीं पर वापस पहुँच जायेगी ? क्या हम अपने पतन की और अग्रसर हैं ? शायद ही हममें से किसी को घडी की टिक टिक और कैलेंडर पर बदलती निरंतर तारीखों के बीच एक शून्य दिखाई दे रहा है जिसकी ओर हम तेज़ी से बढते जा रहे हैं | हम सब एक ऐसे नाज़ुक वक्त से निकल रहे हैं जहां बस एक सिरा ही बच गया है हमारे पास और अगर अभी ही उस सिरे को पकड़ कर वापस अपनी और खींचा गया तो वो दिन दूर नहीं जब हम वापस पचास साल पीछे नहीं बल्कि कई हज़ार साल पीछे पहुँच जायेंगे, जहाँ से हमने आपको इंसान कहना शुरू किया था |
1 comment:
I agree with u dear, hope people would reallize money is less important that giving time and maintain relationships.
Post a Comment