Friday, 15 June 2012

इबादत

आजकल के वक्त में जब इंसान को इंसान के लिए वक्त नहीं और जिंदगी बस भागती दिखती है किसी एक अनजान मंजिल की ओर,ऐसे में बहुत ज़रूरी हो जाता है कि सामने वाले शख्स को हम ठीक तरह से परख लें |क्यूंकि आगे चलकर वो कुछ यूं बदल जाते हैं कि अपने आप पर खीज उतारने के अलावा और कोई रास्ता दिखाई नहीं आता |मैं भी नहीं पहचान पाता इंसानों को |बहुत कम में ही उनको अपना मान लेता हूँ |वक्त बेवक्त उनका इम्तिहान नहीं लेता ये जानने के लिए कि वो वाकई मेरे लायक है की नहीं |प्यार को जबसे समझा है उसके मायने मेरे लिए औरों से कुछ हठ कर ही रहे हैं हमेशा |यह नहीं कहूँगा की मैं ही दुनिया का सबसे समझदार इंसान हूँ या प्यार के बारे में मुझसे अच्छा और कोई नहीं जानता |पर यह बात ज़रूर है कि प्यार को औरों की तरह कभी प्यारसमझा ही नहीं | मेरे लिए तो वो  इबादत है |
मैं नास्तिक तो नहीं लेकिन मंदिर,गुरुद्वारे या चर्च भी नहीं जाता |अल्लाह को हर समय यह जताने के लिए कि मैं उससे कितना डरता और कितना मानता हूँ, किसी तरह का व्रत नहीं रखता | मैंने हमेशा ऊपर वाले को यहीं ज़मीन पर देखा है, हम सब के बीच, हँसते बोलते, नाचते गाते | वो और कोई नहीं है, वो हमारे अंदर है | वो हर उस इंसान में है जिसको उसनें अपने हाथों से तैयार करके इस कायनात का हिस्सा बनाया है |और अगर आप किसी इंसान को प्यार कर रहे हैं तो यानी आप खुद ऊपर वाले के करीब आ रहे हैं |और अगर वाकई आप उसको इतना पसंद करते हैं तो आप सिर्फ प्यार करके नहीं रोक पायेंगे खुद को |आप उसकी रूहानियत में कुछ इस कदर खो जायेंगे कि आपका प्यार कब इबादत में तब्दील हो जायेगा यह आप खुद ही नहीं जान पाएंगे | और इबादत में तो सब जायज़ है | लोग एक एक दिन तक  एक पहाड़ पर चढ़ते हैं सिर्फ ऊपर जाकर तीन छोटे छोटे पत्थरों की अराधना करने के लिए जिसे वो वैष्णो देवी कहते हैं | कोई मीलों दूर का सफर करके सिर्फ मक्का इसलिए जाता है क्यूंकि उसको यकीन है की अल्लाह वहीं रहते हैं |लोग हर सोमवार, मंगलवार, गुरु या शनि को निराहार रहते हैं सिर्फ इश्वर को बताने के लिए की वो उसे कितना मानते हैं |यह सब आखिर क्या है | क्या यह पागलपन है ? यह उन सबका यकीन है | यकीन, जिसको किसी ने थोपा नहीं उनपर | यकीन, जिसको उन्होनें खुद बनाया है अपने अंदर | ठीक उसी तरह मेरा यकीन है कि मेरा अल्लाह उसी में है जिसको मैं दिलो जान से चाहता हूँ |फिर वो कितनी भी बड़ी कुर्बानी मांग ले तो ज़रा गम नहीं मुझे |अगर खुद मोहम्मद नें अपने बेटे की बलि चढाने से और ईशू नें सूली पर टंग जाने से पहले एक बार को नहीं सोचा तो मैं तो सिर्फ एक अदना सा इंसान ही हूँ |बस इसलिए सहता गया और इबादत समझ कर हर वो कोशिश करता रहा जो आम इंसान की नज़र में बेवकूफी ही कही जा सकती है | तो लीजिए सरकार अब भुगत लीजिए अपनी इस इबादत का नतीजा | पर मुझे शिकायत नहीं ऊपर वाले से | नाराज़ है शायद मुझसे | इंसान ही तो हूँ | जाने अनजाने कोई न कोई भूल ज़रूर कर बैठा होऊंगा कि इतना नाराज़ हो गया मुझसे | पर वो हमेशा नाराज़ नहीं रहता | मुस्कुराता है, थोडा देर से ही सही लेकिन मान जाता है |  वक्त बहुत लेता है मगर | आखिर कोई हमारी आपकी तरह तो है नहीं की बस किसी भी प्रलोभन को देखकर औंधा गिर पड़े उसपर | खुदा है, और खुदा अपना वक्त लेता है | लेना भी चाहिए ताकि हमें हमारी भूल का पूरी तरह एहसास हो। 
जीवन की यह विडंबना देखिये, ऐसे बहुतों की जिंदगियों में चार चाँद लगाये मैंने जो कि कुछ इसी तरह के या इससे भी मुश्किल हालात में थे |बस अपनी ही दुनिया को नहीं संवार सके बाकि सबकी रौशन ज़रूर कर दी | अच्छा लगता है आज जब वो लोग मिलते हैं, मुझसे बात करते हैं | मुझे याद रखते हैं | ऐसा लगता है की मानों अल्लाह खुद मुस्कुरा रहा हो | कह रहा हो की क्या खूब इस्तेमाल किया है उसकी दी हुई ताकत का | इसीलिए बस वही करता हूँ जो मुझे आता है अच्छी तरह करना |लोगों के चेहरों पर खुशियाँ बिखेरना |उनकी जिंदगी को रौशन बनाना |उनके हर गम को अपना समझ कर उसका कोई न कोई हल निकालने की कोशिश करना | हाँ अब थोडा थक जाता हूँ कभी कभी | कभी आँखों में आता सैलाब साथ नहीं देता, तो कभी दिल में लगातार हो रहा दर्द सुई की नोक की तरह चुभने सा लगता है, कभी सांस लेते रहने के लिए दिमाग को फिर याद दिलाना पड़ता है तो कभी जिस्म ही इतना निढाल सा लगता है कि लगता है कि अब जान चली गयी शायद | लेकिन वो रवि ही क्या जो हार मान जाये | बड़ा आम सा नाम लगता था मुझे -रवि | एक दम घटिया | एक ही वजह बताई गयी इसकी मुझे बचपन से | क्यूंकि मेरा बड़ा भाई जो की अब हमारे बीच में नहीं है उसका नाम रविन्द्र था इसलिए उसके जाने के डेढ़ साल बाद पैदा होने पर मेरा नाम रवि रखा गया | पर जैसे जैसे अपने आप को समझा, तब जाना कि शायद येही नाम सही है मेरे लिए | क्यों ? इसलिए क्यूंकि सूरज निरंतर काम करता है | हर मौसम, हर रोज बिना थके, बिना हारे रोज निकल आता है सुबह सृष्टि में अपनी रौशनी बिखेरने के लिए | दूसरों को रास्ता दिखाता है | खुद दिन भर जलता है लेकिन लोगों को गर्माहट ज़रूर देता है |मैं भी उसी सूरज की ही तरह हूँ जो की अपनी ही गर्मी में जलता रहता है |मेरी कोशिश रहेगी की अपने नाम के अर्थ को हमेशा इसी तरह सार्थक सिद्ध करता रहूँ |

1 comment:

neema said...

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