Wednesday, 4 July 2012

मेरे शौक

आप लोगों ने हमेशा मुझे संजीदा लिखते देखा होगा |अक्सर देखते होंगे कि मैं बेहद भारी भारी बातें करता हूँ |ज़ाहिर बात है आप में से कुछ थक भी जाते होंगे, कुछ इसी तरह की बातें सुनते सुनते | मुझे भी अच्छा नहीं लगता कि हर समय मैं आप सबको इतनी भारी बातों से थकाऊँ|चलिए आज इस महीने की शुरुआत करते हैं कुछ हल्के से |जैसा कि आप सब लोग अब तक समझ ही चुके होंगे कि मुझे या तो बहुत सोचने का शौक है, गाने का शौक है या फिर बस बे सिर पैर की बातें करने का |पर इसके अलावा भी मेरे कुछ ऐसे शौक हैं जिनके बारे में शायद बहुत कम लोगों से ज़िक्र किया है मैंने |हालाँकि ऐसा भी शौक नहीं की बताने में ही शर्म आ जाये लेकिन बस न जाने क्यों मुझे थोड़ी सी तो आ ही जाती है |और वो शौक है लज़ीज़ खाना खाने का |आप सबको हंसी ज़रूर आ रही होगी यह सुनकर, लेकिन आपको नहीं पता कि मुझे ये बताते हुए कितना अजीब सा लगता है |खैर साहब,अब जब सोच ही लिया तो बे पर्दा हो ही जाता हूँ आप सबके सामने |                   

  असल में मेरा ये शौक शुरू हुआ आज से तकरीबन अट्ठाईस साल पहले जब मैं एक साल से थोडा बड़ा हुआ करता था |मुझे तो ठीक से याद नहीं लेकिन मेरे उस समय शायद कुछ ही दांत निकले थे |मगर उन छोटे छोटे दांतों और चटोरी जीभ नें तभी से अलग अलग तरह के जायकों का स्वाद लेना शुरू कर दिया था |उस वक्त मैं अपने परिवार के साथ सेंटर दिल्ली के मशहूर इलाके गोल मार्केट में रहता था |जब एक महीने का था तबसे हम सब लोग वहीं रहने लगे थे और आने वाले सात साल यही हमारा रैन बसेरा रहा |जैसा कि आपको नाम सुनकर ही लग रहा होगा गोल मार्केट इलाके का नाम,एक गोलाकार आकार में बने मार्केट के नाम पर ही पड़ा है |करीब सौ साल से भी पहले जब अंग्रेजों नें कलकत्ता से अपनी राजधानी को शाहजहानाबाद यानि दिल्ली बनाया तबसे उन्होनें दिल्ली में तमाम तरह के बदलाव किये| उसमें इण्डिया गेट, संसद भवन और न जाने कितनी बड़ी बड़ी इमारतें शामिल थी |पर तमाम सुविधाएं मिल जाने के बाद भी अंग्रेजों को दिल्ली में वो जायका न मिल सका,जो उन्हें कलकत्ता में मिलता था |और खासतौर पर मुलायम गोश्त तो शायद उनके दस्तरखान से गायब ही रहने लगा था |इसके अलावा उनके साथ बंगाल से भी बहुत से लोग यहाँ आ बसे थे और वो भी मांसाहारी खाने के बिना,खाना ही बेकार मानते थे |अंग्रेजों के लिए यकायक पैदा हुई इस गंभीर समस्या का समाधान उन्होनें गोल मार्केट को बनाकर किया |बमुश्किल एक चौराहे के बराबर का ये मार्केट केवल एक ही मजिल का है |आज भी इसमें टूटते और झड़ते सीमेंट के बीच से झांकती पुरानी लखौरी ईंटे शायद कभी कभार आपको दिख जायें |छत के नाम पर हरी काई के पुराने हो जाने से कत्थई पड़ चुकी खपरैलों का एक मकडजाल सा है जो कि आज भी बारिश के मौसम में पानी की चंद बूंदों को ही अन्दर जाने की इजाज़त देता हैं |बदरंग सा पीला रंग जो न जाने क्यों हमारा सरकारी रंग बन गया है इस पूरी इमारत के हर कोने में है |हालाँकि कुछ दिनों में इसके झड़ते ही सफ़ेद चूने के पुरानी परत भी जल्द ही दिख जाती है|कई किलोमीटर दूर से ही बिना देखे भी आप ये जान सकते हैं कि आप गोल मार्केट पहुँचने वाले हैं क्यूंकि दूर से इसके ऊपर उड़ते हुए गिद्ध साफ़ नज़र आ जाते हैं |गिद्धों के बीच शायद इस जगह को काफी पसंदीदा माना जाता है |उनके पास वजह भी है |आखिर हर तरफ बिखरे नर्म तीतर और बटेर तो दिल्ली जैसे शहर में मिलना मुश्किल ही है |लेकिन इसका आकर्षण तो हैं इसकी गोलाई में बनी कई सारी खाने की दुकानें|हर दूकान अपने आप में खाने का खज़ाना ही समझ लीजिये |रोज़ शाम को जब सूरज कुछ थकने सा लगता है तब गोल मार्केट के उस गोले के चारों ओर सुलगे तन्दूरों में से ऐसी सुगंध फैलती है कि करीब दो किलोमीटर तक के इलाके में खड़े हर शख्स की नाक से सीधे उसके दिल तक जा पहुँचती है |और हमारी किस्मत देखिये, हम तो माशाल्लाह सिर्फ आधे किलोमीटर की ही दूरी पर ही रहते थे |रोज़ शाम को अचानक मुंह में पानी आ जाना तो मेरे लिए आम बात हो गयी थी | अंग्रेजों नें भले ही दिल्ली के लिए कुछ भी बना दिया हो लेकिन मेरे लिए तो गोल मार्केट ही उनकी बनाई सबसे पंसीदा इमारत रही |

ऐसा नहीं है कि सारी तारीफ की हकदार वो इमारत ही है |मैं खुद भी ऐसे परिवार से हूँ जो कि लखनऊ से है, जहाँ के मुगलिया खाने की तो जितनी भी तारीफ की जाये कम है |लेकिन बस मलाल इसी बात का रहता था कि मेरा पसंदीदा रोगन जोश सिर्फ शुक्रवार और शनिवार को ही मेरे इस पागलपन को कुछ ठंडा कर पाता था |ये तो शुक्र है की मेरे वालिद इस नियम को लेकर सख्त थे,वरना शायद मैं इससे भी कहीं ज्यादा बेडौल होता, जितना की आज हूँ | बाकी के बचे हुए दिनों में मेरी माँ मुझे हरी दिखने वाली लगभग हर मुमकिन चीज़ खिलाने से नहीं चूकती थी |लेकिन हम तो हम हैं, इसलिए उसमें से भी तीन खास सब्जियों को मैंने अपने ज़िन्दगी का साथी बना लिया | आलू, प्याज और टमाटर | यही तीन मेरे दुःख सुख के साथ साथी बन गए |और हर हरी चीज़ को इनके साथ लपेटकर निगल जाना आसान होता चला गया |दीवानगी कुछ इस हद तक बढ़ गयी कि जग ज़ाहिर हो गयी और इन तीनों सब्जियों के लिए मेरे प्यार के बारे में मेरे घरवालों नें तो सारी दुनिया को बताकर, मुझे रुसवा करने में कोई कसर भी न छोड़ी |चाहें दिल्ली की चाट हो, लखनऊ के टुंडे कबाब, राजस्थान का दाल बाटी चूरमा, पंजाब का मक्खन में डूबा खाना, जामा मस्जिद के पीछे की बिरयानी हो, इटैलियन, कोरियन, चाईनीज़ डिमसम, लेबेनीज़ शवरमा या थाई करी, न जाने क्या क्या खाया इतने सालों में | देश भर में जगह जगह हर किस्म का खाना खाया |जिस बेहिसाब तरीके से मैंने खाने के अपने इस शौक को पिछले कुछ सालों में पूरा किया है उस हिसाब से मेरी शक्लोसूरत कुछ और ही हो जानी चाहिए थी, लेकिन वो तो ऊपर वाले नें साथ दिया है, शायद इसी वजह से अभी भी लोगों को मेरे इस शौक के बारे में नहीं पता चल पाता जब तक कि मैं खुद न बता दूं या वो मुझे खाता न देख लें | पर अब ये शौक कम, साथी ज्यादा लगता है | शायद साथी कम रह गए हैं या यह शौक ही ज्यादा बढ़ गया है | जो भी हो, पर इस बात का सुकून ज़रूर है कि कोई साथ दे न दे, कम से कम मेरे शौक तो मेरे अपने हैं |

1 comment:

neema said...

Now i know u bit more,, After coming ur more articles i would say now that i am in a process of knowing a person who is also "shaukin khane ka" like me,, i luv this article too,, like i have never seen, "Gol Market " but u have placed me at this place by ur words in my imagination,, luv ur writing dear, its always being treat for heart and mind to read u.