अब तक आप सभी मुझे एक लेखक के तौर पर कुछ हद तक तो जान ही चुके होंगे |आईये आज मैं आपको अपने में छिपे एक शायर से भी मिलाता हूँ जो कभी कभी कुछ लिखने का शौक रखता है |उम्मीद है आप सबको मेरी ये कोशिश अच्छी लगेगी |
तन्हाई के उन अंधरों में तुम बहुत याद आये
दोज़ख में काटे दिन, न जाने कब मौत आये
ए खुदा तू भी गया रूठ मुझसे
बेजाँ जिस्म की रूह नोचते, वक्त के ये साए
एक ज़माने में ख्वाबों का गुलिस्तां, महका करता था जहां
सेहरा की आंधी में, सिसकियाँ लेते बेरंग मौसम आये
ऐतबार न था खुद के, हौसले पे तुझसे पहले
वादों के दामन पर, बेइंतहा पैबंद आये
क़यामत किसको कहते हैं, ये हमें मालूम न था
यूं अचानक सामने, हसरतों के कातिल आये
यूं अकेले कब तलक, सन्नाटों से लडूंगा
दामन-ए-सब्र भी, बेबसी की इन्तहा से आजिज़ आये
कैफियत थी कुछ ऐसी, कि आसुओं में बह गयी
ग़मों से दोस्ती कर, खुदी को खुश करते आये
नाकाफी क्यों लगता है, इस दिल का धड़कना
साँसों से कश्मकश थी, कब्रों में बसने आये
तन्हाई के उन अंधरों में तुम बहुत याद आये ..
तन्हाई के उन अंधरों में तुम बहुत याद आये ..
No comments:
Post a Comment